श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४२ ☆
☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।
आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।
अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।
बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।
नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।
अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।
आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।
रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 22-02-2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




