श्री जगत सिंह बिष्ट
(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)
🌱 हास्य-व्यंग्य – सौम्य, सरल, सर्वप्रिय! 🌷
वाटिका में भ्रमण के उपरांत, देवी अपनी सखी के संग, प्रासाद के प्रवेश द्वार पर पहुँची ही थीं कि दृष्टि ठिठक गई। यह क्या! द्वारपाल के बगल में साक्षात् नारद मुनि, अपनी वीणा हाथों में थामे, विराजमान हैं। मुख पर वही शाश्वत मुस्कान, जैसे युगों से समस्त लोकों का रहस्य जानकर भी निष्पाप बने हों।
“नारायण, नारायण! एक लघु निवेदन है,” उन्होंने वीणा के तारों को हलके से झंकृत करते हुए कहा, “संध्याकाल में भीतर देवियाँ गोष्ठी करती हैं। अति आनंददायक! हास्य, विनोद, रस-परिहास—सब कुछ। आपकी भी उपस्थिति प्रार्थनीय है। अवश्य पधारें!”
वीणा के स्वरों ने मानो आकाश में अदृश्य कमल खिला दिए। वे स्वर ऐसे थे कि वायु भी ठिठककर सुनने लगे। देवियों के हृदय में उनके स्मरण का एक कोमल कक्ष निर्मित हो गया—जहाँ वे प्रतिदिन संध्या से पूर्व जाकर विराजते।
संध्याकाल में वे गोष्ठी स्थल के आसपास अपनी वीणा के तार झंकृत करते दृष्टिगोचर होते। कभी किसी की आरती की थाली सँभाल देते, कभी किसी की पायल का टूटा घुँघरू जोड़ देते। संरक्षण का ऐसा भाव कि मानो स्वयं त्रिलोक के अभिभावक हों। देवियाँ उनके इस सौजन्य से अभिभूत रहतीं—“देखो, कितने सज्जन हैं! कितने सरल!”
और वे, अत्यंत विनीत भाव से, थोड़ी दूरी पर खड़े रहकर भी सबके निकट बने रहते—जैसे चन्द्रमा, जो स्पर्श तो नहीं करता, पर प्रकाश से सबको अपने घेरे में ले लेता है।
महाशिवरात्रि का पर्व निकट आया। पुनः वही मधुर मुस्कान, वही सम्मोहन।
“शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में अति सुंदर आयोजन है। अवश्य पधारें, महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करें,” उन्होंने कहा।
उत्सव की संध्या पर वे भोले बाबा-सी अलमस्त चाल में चहुं दिशा विचरते रहे। कहीं दीपक प्रज्वलित करा रहे हैं, कहीं भस्म का तिलक लगा रहे हैं। देवियाँ श्रद्धा से गदगद। कोई कहे—“क्या तपस्वी पुरुष हैं!” कोई कहे—“कितने सजग, कितने सतर्क!”
किंतु अद्भुत यह कि जहाँ-जहाँ देवियाँ एकत्र हों, वहीं-वहीं वे अनायास प्रकट हो जाते—जैसे वसंत की हवा, जिसे किसी ने बुलाया न हो, फिर भी वह आ ही जाती है।
और आज—होली का दिवस।
वह कृष्ण-कन्हैया मुद्रा में हैं। अधर पर मुरली, नेत्रों में अर्धनिमीलित करुणा और चपलता का संगम। गोपिकाएँ उन्हें घेरे हुए हैं। गुलाल और पुष्पों की वर्षा हो रही है। वातावरण में रंगों का ऐसा जादू कि स्वयं इन्द्रधनुष भी ईर्ष्या से फीका पड़े।
उनकी सौम्यता आज भी अक्षुण्ण है। मुख पर वही सहजता, मानो कुछ हुआ ही न हो। परन्तु रंग की एक महीन परत उनके वस्त्रों पर नहीं, उनके चारों ओर फैली प्रतिष्ठा पर भी चढ़ती प्रतीत होती है।
आँखें मूँदकर, वे मन ही मन गुनगुना रहे हैं—
“रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे…”
वीणा के तार जैसे स्वयं ही थिरक उठते हैं।
देवियाँ हँसती हैं, इठलाती हैं, उन्हें और रंगती हैं। और वे—सबके प्रिय, सबके हितैषी, सबके ‘अपने’—रंगों के इस महासमर में भी अदृश्य मर्यादा की रेखा खींचे रहते हैं, जिसे कोई देख नहीं पाता, पर सभी मानते अवश्य हैं।
लोक-लाज के आँगन में, भलमनसाहत की ओट में, उनका यह चिर-परिचित चरित्र यूँ ही विचरता रहता है—
सौम्य, सरल, सर्वप्रिय।
(बुरा न मानो, होली है!)
© श्री जगत सिंह बिष्ट
साधक
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈





