सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ हास्य – व्यंग्य ☆ अरी भागवान – क्यों लाल पीली हो रही हो…? ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

-अरे अरे,ये क्या ले आये ? धनिया, पालक,चुकंदर, मेहंदी, अनार, पलाश — मैंने तो रंग- गुलाल लाने कहा था।

— रंग ही तो लाया हूँ। ध्यान से देखो —

हुस्न रंगीन है न सादा है

बस अपनी अपनी निगाह होती है

— मेरी निगाह दुरुस्त है। मजाक ऐसा भी करते हैं क्या।

— मैं तो होली के मूड में हूं। मजाक तो शेयर मार्केट जनता के अरमानों से कर रहा है। धम्म धड़ाम धड़ाम धप्प–!

— तुम्हें ना हर बात में राजनीति का रंग पोतने की आदत है।आज तो बख्श़ दो।नेता क्यों नहीं बन जाते ?

— कैसे बनूँ।ईमानदार हूँ।

— आप ही बताओ अब टोटो को क्या जवाब दूँ।वो कब से इंतज़ार कर रहा है।

— ऐसे कहो ना।तुम्हें सिंथेटिक रंग चाहिए।

— और क्या !जो जमाना कर रहा है उससे अलग चलकर क्या बताना चाहते हो ?

तुम मुझे किम जोंग तो नहीं कह रही हो।

— लगता है तीर निशाने पर लगा है।

और ये कोकोनट ऑइल और क्रीम किसलिए?

— छोड़ो भागवान।बहुत कुछ तुम्हारे बस का नहीं है।चलो पुराने कपड़े निकाल दो।

— ‘सारे होलीयाने मौसम का कचरा कर दिया।तुम कब सुधरोगे ?

— जब ट्रंप सुधरेंगे।ही ही ही ही

तुम खुद को जेलेंस्की समझ रही हो क्या ?

— नहीं मैं जार्जिया मेलोनी समझूं, तुम्हें क्या !

एक और पैकेट है।दही और बेसन।चालीस में ही सठिया गये हो लगता है।हे भगवान।तुम्हें क्या हो गया है।

— मुझे रंगरोग हो गया हो।तुम समझती क्यों नहीं।

— ‘तो समझाओ ना

— आओ ना। थोड़ा और करीब आओ। नज़र तो मिलाओ।

— लगता है रोमांस की भाँग चढ़ गयी है।

— एक दिन तो रंगीन होने दो। यह पति का संवैधानिक मूलभूत अधिकार है। सरकारें आयेंगी जायेंगी पर इसमें अमेंडमेंट नहीं होने वाला।

— पड़ोसन आ रही है।

— आने दो।काहे का डर है।बाली उमर है।

— तुमसे तो बात ही करना बेकार है।

— तो चीत करो ना।बातचीत बन जायेगी।

— देखो डार्लिंग। अब काम की बात करें। रासायनिक रंगों से तौबा करो। इनसे कैंसर, अंधत्व और त्वचा रोग का खतरा रहता है।

रंग खेलने से पहले धूप का चश्मा लगाओ। रंग न छूटे तो दही बेसन का लेप लगाओ।

— हां जी सच कहते हो हर्बल रंगों का ही उपयोग करना चाहिए

— ‘अरे अरे अरे– ये क्या तुमने तो टेसू के रंग से रंग डाला।

— खुद को फन्ने खाँ समझते हो। मैं पहले ही टेसू उबाल चुक थी।

ही ही ही ही।नहले पे दहला।

बुरा न मानो होली है। होली है भई होली है। कबीरा सर र र, सर र र।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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रश्मि लहर
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बहुत अच्छी लगी सार्थक संदेश देती हुई लघुकथा!! आपकी हर विधा पर पकड़ है! साधुवाद!