श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एन.पिचाई…“।)
अभी अभी # ११२६ ⇒ आलेख – एन.पिचाई
श्री प्रदीप शर्मा
आज से ठीक ५५ वर्ष पूर्व, आज ही के दिन, यानी २२ अक्टूबर १९७१ को, जब मेरा सितारा गर्दिशों में था, तब जिस सितारे ने मेरी किस्मत बुलंद की थी, उस चमकते सितारे का नाम था बैंक ऑफ इंडिया! और इस सितारे का संदेश था ; YOU HAVE A FUTURE IN THIS STAR. वर्तमान की चिंता सब करते हैं, कौन आजकल किसी के भविष्य की गारंटी लेता है। आज ७५ वर्ष की उम्र में भी अगर मेरा भविष्य सुरक्षित है, तो उसका श्रेय इस सितारे को ही जाता है।
क्या विचित्र संयोग है! आज ही के दिन, पुंगलिया भवन, सांटा बाज़ार, में मेरा पहला दिन, और मेरे पहले बॉस थे मिस्टर एन.पिचाई! और आज इतने वर्ष बाद भी गूगल के मिस्टर सुंदर पिचाई मेरे ही नहीं, दुनिया के साथ हैं। लगता है, हमारा अतीत, वर्तमान और भविष्य साथ साथ है।।
मिस्टर एन.पिचाई एक दक्षिण भारतीय सांवले युवा बैंक अधिकारी थे, धारा प्रवाह अंग्रेजी और टूटी फूटी हिंदी की जुगल बंदी उनकी कार्य कुशलता में चार चांद ही लगाती थी। सौम्य, सांवले रंग के इस व्यक्तित्व पर सुनहरा चश्मा इनकी बुद्धिमत्ता का परिचायक था। वह जमाना कम्प्यूटर का नहीं था लेकिन मिस्टर पिचाई तब भी किसी मशीन से कम नहीं थे।
मैने कभी पैसे को हाथ का मैल नहीं समझा, लेकिन जब पहले ही दिन मिस्टर पिचाई ने मुझे कैश डिपार्टमेंट में नोट गिनना सिखाया, तब पहली बार माया का यह रूप भी देखने में आया। महीने की पहली तारीख को तनख्वाह के नोट गिनना, और कैश काउंटर पर नोट गिनने का अंतर भी मुझे जल्द ही समझ में आ गया। शाम को जब तक कैश का मिलान नहीं हो जाता, मायावती पीछा नहीं छोड़ती थी।।
मिस्टर पिचाई हमारे कैश डिपार्टमेंट के भी इंचार्ज थे। हमारे एक वरिष्ठ सहयोगी उन्हें मिस्टर पिच्ची कहकर बुलाते थे। एक कुएं के मेंढक की तरह तब, नोटों की दुनिया ही हमारी दुनिया थी और मिस्टर पिचाई हमारे एकमात्र बॉस। बैंक का कारोबार का समय खत्म होने के बाद लंच टाइम। बैंक से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही, हमारी एक ही मंजिल होती थी, सराफा और सीतला माता बाज़ार। चाय, पान और सिगरेट तब व्यसन की नहीं शौक की गिनती में आते थे। पान वाले के यहां एक कांच की बरनी में गटागट जैसी गोली देख मुझे कौतुहूल हुआ, तो पता चला, वह तो मनोहर मुनक्का अर्थात् भांग की गोली है।
लंच के बाद कैश की बैलेंसिंग होती थी।। कैश के भी दो काउंटर होते थे, नकद प्राप्ति और नकद भुगतान के। अगर कैश ज्यादा निकला तो उसकी रिपोर्ट और कम निकला तो उसकी भी रिपोर्ट। अधिक निकली राशि आपकी जेब में नहीं जाती थी, लेकिन अगर राशि कम निकली तो आपकी जेब से ही वसूली जाती थी।।
इतना ही नहीं, सौ सौ की हर गड्डी दो लोगों द्वारा गिनी जाती थी तथा उन नोटों की बाद में साॅर्टिंग भी की जाती थी। खराब नोट प्रचलन के बाहर किए जाते थे, उन्हें सॉइल्ड नोट कहते थे और अच्छे रि-इशुएबल नोटों की अलग गड्डियां बनाई जाती थी। इन गड्डियों पर भी दो कैशियर के हस्ताक्षर होते थे, जो उन नोटों की गुणवत्ता और मात्रा के लिए जवाबदेह होते थे। गड्डी में नोट नकली भी हो सकता था और कम ज्यादा भी। पुराने नोट रिजर्व बैंक भेज दिए जाते थे। आजकल हर बैंक की अपनी करेंसी चेस्ट है, और नोटों की गिनती भी मशीन ही करती है। हर बैंक आजकल रिजर्व बैंक से कम नहीं।
आज २२ अक्टूबर है। मिस्टर एन. पिचाई वापस अपने तमिल प्रदेश चले गए। बाद में कभी उनसे संपर्क भी नहीं हो पाया। लेकिन बहुत कम समय में, ऐसा बहुत कम होता है, कि कोई आपके इतने करीब आ जाता है, कि उसकी याद में आप सदियां गुजार दो। गन्ना तो मीठा होता ही है, सांटा बाजार की यादें तो फिर और भी मीठी ही होंगी।
एक सेवक मालिक को कभी अलविदा नहीं कहता। सबका सितारा बुलंद होता है। जैसे आज हमारा और हमारी बैंक ऑफ इंडिया का। मिस्टर एन.पिचाई और मिस्टर सुंदर पिचाई, इनका मालिक भी एक ही है। सबका मालिक एक..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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