श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आवश्यक/अनावश्यक…“।)
अभी अभी # ११२९ ⇒ आलेख – आवश्यक/अनावश्यक
श्री प्रदीप शर्मा
जहां संपन्नता और अभाव के बीच खाई हो, have और have nots लोकतंत्र की गाड़ी के दो पहिए हों, वहां आवश्यक और अनावश्यक की बात करना बेमानी है। अगर आदमी भी पृथ्वी के अन्य प्राणियों की ही तरह होता तो शायद उसे रोटी और मकान के साथ कपड़े की जरूरत भी नहीं होती। एक सभ्य और बुद्धिमान प्राणी होने के कारण उसकी कई मूलभूत जरूरतें हैं, वह पशुवत जीवन नहीं जी सकता।
किसके लिए क्या आवश्यक है और किसके लिए क्या अनावश्यक, यह हम कैसे तय कर सकते हैं। क्या आज के सभ्य समाज में, सभी को एक ही लाठी से हांका जा सकता है?
आवश्यकता, आविष्कार की जननी है, मनुष्य की आवश्यकताएं बढ़ती गईं, आविष्कार होते चले गए। निरंतर विकास ही मानवता की नियति है।
आदमी चांद और सितारों से बहुत आगे निकल गया है। वह इतना बुद्धिमान और साधन संपन्न हो चला है कि टेस्ट ट्यूब बेबी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बल पर अपने भाग्य की लकीर पुरुषार्थ से लिखने लगा है। विकास के साथ साथ विनाश के सूत्र भी आज उसी के हाथ में हैं। जैविक हथियार से अभी अभी पूरी मानवता बुरी तरह आहत और क्षत विक्षत हो ही चुकी है।
क्या युद्ध, नरसंहार, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार भी विकास के ही बाय प्रोडक्ट हैं। क्या इस सामाजिक विषमता की जड़ में कहीं न कहीं असमानता, अन्याय और शोषण तो नहीं मौजूद है। क्या हम इसे ईश्वर की इच्छा अथवा व्यक्ति के प्रारब्ध भोग से जोड़कर निश्चिंत हो जाएं, अथवा शोषित को ही इसका जिम्मेदार मानकर पल्ला झाड़ लें। क्या व्यक्ति के अनावश्यक धन संग्रह और लोभ लालच पर कोई लगाम कसी जा सकती है। यह काम बिल्ली के गले में घंटी बांधने जितना आसान भी नहीं।।
काश हम नेकी, इल्म और ईमान की राह पर चल पाते। अनावश्यक धन संग्रह, इज़ी मनी, बईमानी, लूट और रिश्वत के पैसे से तौबा कर पाते, तो आर्थिक विषमता के भागी नहीं बनते। पैसा, पद और पॉवर की अंधी दौड़ में हम जितने आगे निकलते जाएंगे, इंसानियत उतनी ही पीछे छूटती चली जाएगी।
आवश्यक/अनावश्यक की तराजू हमारा विवेक ही हो सकता है, कोई कानून नहीं। आवश्यक संवाद समझदारी की निशानी है और अनावश्यक विवाद नादानी की। हमारे पास से अगर अनावश्यक की भीड़ हटाई जाए, तो आवश्यक सम्मान पाए। दीपावली की सफाई में बहुत कुछ अनावश्यक हम निकाल फेंकते हैं, केवल आवश्यक को सजाते संवारते हैं। आवश्यक सबको नसीब हो, अनावश्यक खर्च और बर्बादी पर हम स्वयं ही लगाम लगाएं, तब ही हम एक संपन्न और विकसित देश कहला सकते हैं।।
© श्री प्रदीप शर्मा
संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर
मो 8319180002
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






