श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “करवाचौथ : चाँद से आगे, संबंधों के भीतर…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०४ ☆
☆ करवाचौथ : चाँद से आगे, संबंधों के भीतर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
चाँद सदियों से मनुष्य की प्रतीक्षाओं का साक्षी रहा है। कभी वह विरह की रातों में स्मृतियों को उजास देता है, तो कभी प्रेम की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है। करवाचौथ की रात भी इसी चाँद के नाम होती है, किंतु इस पर्व का अर्थ केवल चंद्रदर्शन और व्रत के पारण तक सीमित नहीं है। यह उस संबंध को भीतर से देखने का अवसर भी है, जो दो व्यक्तियों को जीवन की अनिश्चितताओं के बीच एक-दूसरे का संबल बनना सिखाता है।
मेहँदी की लाली, चूड़ियों की खनक, माँग का सिंदूर और पूजा की थाली इस पर्व के दृश्य पक्ष हैं; किंतु इनके भीतर एक अदृश्य संसार भी बसता है—प्रेम, विश्वास, मंगलकामना और साथ बने रहने की आकांक्षा का संसार। परंपराएँ तभी जीवंत रहती हैं, जब उनके साथ संवेदनाएँ भी जीवित रहें। दांपत्य की सार्थकता किसी एक की तपस्या में नहीं, बल्कि दोनों की पारस्परिक समझ, सम्मान और सहभागिता में है।
इसी भावभूमि पर मन में कुछ पंक्तियाँ आकार लेती हैं—
चंदा धीरे-धीरे कदम बढ़ाना,
अर्घ्य हमें देना है।
माथे पर सिंदूर की बिंदिया,
माँग सजाए कुमकुम,
गले हार सोहे प्रियतम का,
कानों कुंडल झुम-झुम।
साजन के हाथों पानी पीकर,
अपना व्रत मैं खोलूँ,
शिव-गौरी की पूजा करके,
सदा सुहागन डोलूँ।
गीत की इन पंक्तियों में चाँद से की गई विनती के साथ एक स्त्री का उल्लास, प्रतीक्षा और अपने प्रिय के साथ जीवन बिताने का स्वप्न अभिव्यक्त होता है। परंपरा की सुंदरता भी शायद इसी में है कि वह निजी अनुभूतियों को सामूहिक संस्कृति का हिस्सा बना देती है।
चंद्रमा अंततः आकाश में ही नहीं, हमारी दृष्टि में भी उदित होता है। प्रश्न यह है कि उसके प्रकाश में हम केवल अपने सुहाग की दीर्घायु की कामना करें या उस प्रेम को भी पहचानें, जो जीवन की प्रत्येक कठिन घड़ी में एक-दूसरे का हाथ थामे रहने से पुष्ट होता है। जब व्रत की आस्था के साथ परस्पर सम्मान और उत्तरदायित्व जुड़ते हैं, तभी पर्व अनुष्ठान से आगे बढ़कर जीवन-दर्शन बनता है।
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© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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