श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तत्व प्रेम।)

?अभी अभी # ८३० ⇒ आलेख – तत्व प्रेम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मरहूम किशोर कुमार गांगुली अपनी फिल्म हम सब उस्ताद हैं, में, कह गए हैं, प्यार बांटते चलो ! अब प्यार कोई सुबह का अखबार तो है नहीं, कि घर घर बांटते चलो। ना ही प्रेम कोई रेवड़ी है, जो आंख मूंदकर अपने अपनों में निपटा दी जाए।

एक गीत में रफी साहब शर्तिया प्यार सिखाने की बात करते हैं !

आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ !

गोया प्यार नहीं, कार चलाना सिखा रहे हों। और सीखने वाली भी झट से हां कर देती है, सिखला दो ना। काश, वाकई ऐसा हो जाता, तो जगह जगह इश्तहार पढ़ने को मिलते, 30 दिनों में प्यार करना सीखिए। प्यार का भी लाइसेंस होता, पहले लर्निंग, बाद में परमानेंट। शायद सगाई लर्निंग और शादी पक्का लाइसेंस ही हो।।

कितना अच्छा हो, लोग प्यार में पी एच डी करें। संत महात्मा प्यार में डॉक्टरेट बांटें। प्यार का भी परीक्षा में एक प्रश्न-पत्र हो। प्यार कितने प्रकार के होते हैं ? प्यार के बुखार का कैसे इलाज किया जाता है। और एक अनिवार्य प्रश्न 20 अंक का प्रेम-पत्र। फिर कहाँ नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या के लिए जगह। लोग दुश्मनी ही भूल जाएँ।

प्रेम कहीं सिखाया नहीं जाता, प्रेम की कोई पाठशाला नहीं, कोई विश्वविद्यलय नहीं, फिर भी पशु-पक्षी तक प्रेम करना जानते हैं।

इंसानों में कितना प्रेम व्याप्त है, आप नहीं समझ सकते। कोई किताबों से प्रेम कर रहा है, तो कोई लिखने से। किसी को कविता से प्रेम है तो किसी को शायरी से। लोगों में प्रकृति प्रेमी भी हैं, और पशु-प्रेमी भी। अब गुटका और चाय से प्रेम की बात पर सुबह-सुबह मेरा मुँह मत खुलवाएं।।

आइए, आज हम भी प्रेम की बातें करें ! एक होता है व्यावहारिक प्रेम, जिससे हम whatsapp और फेसबुक वालों से रोज वास्ता पड़ता है। नमस्ते, सुप्रभात, वाला अभिवादन। दफ्तर में, स्कूल कॉलेज में, गुड मॉर्निंग का रिवाज़ है। आप चाहें तो इसे औपचारिक प्रेम भी कह सकते हैं।

परिवारों में भी प्रेम होता है ! मां बेटे का, भाई बहन का, दोस्तों का, प्रेमी-प्रेमिकाओं का, रिश्तेदारों का, और above all पति पत्नी का। यह सब भावनात्मक प्रेम है। आप इसे दिल का मामला भी कह सकते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि

” अब जी के क्या करेंगे,

जब दिल ही टूट गया। “

प्रेम गाय से भी हो सकता है और अपने पालतू कुत्ते से भी। वसुधैव कुटुंबकम् कहने वाले अपने विरोधियों और दुश्मनों को इस प्रेम के दायरे में नहीं आने देते।।

एक प्रेम स्थूल नहीं, सूक्ष्म होता है, यह दिल का मामला नहीं, मन के अधिकार क्षेत्र का मामला है। मीरा और कृष्ण का प्रेम सांसारिक नहीं, स्थूल नहीं, तात्विक प्रेम था। जिस रास का जिक्र होता है, वहां स्थूल सूक्ष्म में समा जाता है। कृष्ण भक्त राधे राधे का जाप करते हैं, और राम भक्त सीताराम सीताराम का।

ईश्वर तत्व, गुरु तत्व और प्रेम तत्व एक ही हैं, इन्हें आप अलग नहीं कर सकते। जिस प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती, वही तत्व प्रेम है। ज़र्रे ज़र्रे में बस रहा है वो, जैसे मुरली में तान होती है। चैतन्य महाप्रभु को वह तत्व प्रेम सारे जगत में व्याप्त दिखता था। नारद भक्ति सूत्र इसी तत्व प्रेम की बात करता है।।

प्रेम गली अति सांकरी ! विराट प्रेम के लिए गोकुल और वृंदावन की गलियों में भटकना क्या ज़रूरी है। जो लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं, वे शायद भक्ति और तत्व प्रेम के अधिक करीब हों, क्योंकि वे प्रकृति के साथ हैं, बहती नदी की तरह उनका प्रेम कहीं ठहरता नहीं, बहता रहता है। जो जहां है, चाहे तो वहीं, उसी स्थान पर इस तत्व प्रेम के सरोवर में स्नान कर सकता है। धारा सतगुरु, लेत नहाय क्यों न।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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