डाॅ राकेश सक्सेना
(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित. आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता: बदलते समय के साथ कदमताल।)
☆ आलेख – वरिष्ठ नागरिक और डिजिटल साक्षरता: बदलते समय के साथ कदमताल ☆ डाॅ राकेश सक्सेना
इक्कीसवीं सदी में डिजिटल साक्षरता मानव जीवन की एक आवश्यकता बन चुकी है। इस तकनीक ने बैंकिंग,चिकित्सा, शिक्षा, संचार,सरकारी सेवाएँ, टिकट बुकिंग, खरीददारी आदि सभी क्षेत्रों में कार्यप्रणाली को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। भले ही इस कार्यप्रणाली ने सुविधाओं के नये द्वार खोले हों लेकिन वरिष्ठ नागरिक इससे विशेष रूप से प्रभावित हो रहे हैं क्योंकि वरिष्ठ नागरिकों ने अधिकांश अपना जीवन उस युग में व्यतीत किया है जब संचार सेवाएँ कागजी माध्यमों पर निर्भर थीं,अत: इनके लिए डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल स्मार्टफोन चलाना सीख लेना ही नहीं अपितु इनको उपकरणों का सुरक्षित, विवेकपूर्ण उपयोग करने के साथ सामाजिक रूप से जुड़े रहने, आवश्यक सेवाओं तक पहुँच बनाने, आर्थिक गतिविधियों को सरल करने और बदलते युग के साथ आत्मविश्वासपूर्वक संवाद स्थापित करने में सक्षम बनाती है। डिजिटल साक्षरता आत्मनिर्भर बनाती है। इसकी सही जानकारी होने पर अन्य व्यक्ति पर निर्भर रहने की आवश्यकता कम हो जाती है, सामाजिक सम्पर्क बनाए रखना आसान हो जाता है, सार्वजनिक और निजी सेवाएँ डिजिटल माध्यम से होने के कारण उपयोग की क्षमता बढ़ जाती है।
प्राय: वरिष्ठ नागरिकों एवं डिजिटल विभाजन के पीछे तकनीकी अनुभव एवं भाषा का अभाव, आर्थिक बाधाएँ, छोटे-छोटे अक्षर, दृष्टि एवं श्रवण सम्बन्धी कठिनाइयाँ, तकनीकी भय एवं आशंका कि कहीं गलत बटन दबाकर कोई नुकसान न हो जाए आदि अनेक कारण हैं,अत: वरिष्ठ नागरिकों को साक्षर बनाने की प्रक्रिया में उनके मन से यह धारणा हटना आवश्यक है। उनको यह समझाना आवश्यक है कि सीखने की प्रक्रिया धीमी होती है। यदि किसी वरिष्ठ को सर्वप्रथम अपने परिवार के दूर बैठे सदस्य से वीडियोकाॅल से सफलतापूर्वक बात करना सिखाएँ तो तकनीक के प्रति उनका विश्वास निश्चित रूप से बढ़ेगा। सिखाने की दिशा में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। परिवारीजन गलती होने पर उपहास न करें, पासवर्ड सुरक्षित रखने के तरीके सिखाएँ, ओटीपी, पिन साझा न करने की आदत को विकसित करें। सिखाने वाले को चाहिए कि वह भय पैदा न करे और सतर्कता व विवेक विकसित करें। बैंकिंग सेवाओं में डिजिटल तकनीक की जानकारी देते समय ‘ कैसे भुगतान करें ‘ नहीं बल्कि ‘ कब भुगतान न करें ‘ भी सिखाया जाना चाहिए।
भारतीय ज्ञान परम्परा में सीखने की प्रक्रिया को श्रेयस्कर बताया गया है। डिजिटल तकनीक वरिष्ठ नागरिक की रुचि के अनुसार साहित्य, संगीत, इतिहास,दर्शन, भाषा, कला, अध्यात्म व सामान्य ज्ञान जैसे विभिन्न विषयों तक पहुँच सकते हैं। डिजिटल समावेशन में परिवार, समाज, सरकारी संस्थाओं, स्थानीय निकायों, बैंकों आदि सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। तकनीक निर्माताओं का उत्तरदायित्व है कि वे बड़े और स्पष्ट अक्षरों, सरल मेनू, आसानी से समझ आने वाले सुरक्षा संदेश आदि विशेषताओं को महत्व दें। डिजिटल साक्षरता सुविधा ही नहीं, यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, सामाजिक सहभागिता के साथ बदलते समय में समान अवसर का माध्यम भी है। यह तकनीक पीढ़ियों के बीच संवाद का माध्यम बन सकती है। यदि बच्चे बुजुर्गों को स्मार्टफोन चलाना सिखाते हैं तो बुजुर्ग भी धैर्य तथा जीवन के अनुभव सिखाते हैं इसलिए यह तकनीकी प्रशिक्षण दो पीढ़ियों में ज्ञान-विनिमय बन जाता है।
अंतत: हम कह सकते हैं कि डिजिटल क्रांति ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है लेकिन इसकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब समाज का कोई वर्ग पीछे न छूटे। वरिष्ठ नागरिक इस डिजिटल परिवर्तन में दर्शक नहीं, सक्रिय सहभागी बन सकते हैं। इस आधुनिक व्यवस्था को वरिष्ठ नागरिकों के लिए अधिक समावेशी बनाना होगा,अत: आवश्यकता है ऐसी डिजिटल संस्कृति निर्माण की , जिसमें तकनीक सुविधा बने, निर्भरता नहीं। ज्ञान शक्ति बने, भय नहीं। सुरक्षा आदत बने, औपचारिकता नहीं और डिजिटल साक्षरता उम्र की सीमा नहीं, जीवनपर्यंत सीखने का अवसर बने।
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© डाॅ राकेश सक्सेना
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