श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९१ ☆ देश-परदेश – विश्व का नया मानचित्र ☆ श्री राकेश कुमार ☆
विगत सप्ताह यूनाइटेड नेशन्स जिसको हम यू एन के नाम से भी जानते हैं, ने एक प्रस्ताव के जरिए विश्व का नया मानचित्र जारी किया है। पूर्व में बनाया गया मानचित्र यूरोप के इटली देश द्वारा सन 1600 से पूर्व काल का है।
अफ्रीका महाद्वीप के कुछ देशों का क्षेत्रफल उनके वास्तविक क्षेत्रफल से कम अनुपात में दिखाया गया है, ऐसी शिकायत के कारण, नए मानचित्र की आवश्यकता आन पड़ी है।
यू एन जैसी संस्था की बात आज के समय कोई मानता ही नहीं है। उसका हाल घर के सबसे बड़े बुजर्ग के समान है, जिसने परिवार के लिए सब कुछ निछावर कर साम्राज्य स्थापित कर, बच्चों के नाम कर दिया था, अब घर के उसके अपने बच्चे ही उसको पूछते ही नहीं है। वो कुछ भी बोले, उसकी बात अनसुनी ही रहती है।
नए मानचित्र को लेकर हमारे एक मित्र जिनका स्टेशनरी सामान का व्यापार है, से लम्बी वार्तालाप हुई, उनको ये शंका हो रही है, इस नए मानचित्र के चक्कर में उनके एक खाली प्लॉट की जमीन कहीं कम ना हो जाय। हमने उनसे कहा ऐसा कैसे हो सकता है, उनका ये मानना है, कि शहर के नए मास्टर प्लान में उनके प्लॉट का साइज एक चौथाई कम हो गया था, अब तो पूरी दुनिया का ही नक्शा बदल रहा है, सरकार इस नाम से उनकी जमीन का कुछ भाग, डकार जाएगी।
हमने उनके दर्द को कम करते हुए कहा, अब सभी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों आदि में दुनिया का नए मानचित्र लगाया जाएगा, बच्चे नए “ग्लोब”, गत्ते के स्टेंसिल आदि भी खरीदेंगे। आपकी तो दीवाली हो जाएगी।
इंतजार करें, हमें कब विस्तृत नया नक्शा देखने को मिलेगा।
© श्री राकेश कुमार
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