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श्री दिव्यांशु शेखर 

(युवा साहित्यकार श्री दिव्यांशु शेखर ने अपने गृहनगर सुपौल, बिहार से प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। उसके बाद, उन्होंने जेपी यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वह पेशे से एक अभियंता है और दिल से एक कलाकार। वह कविताएँ, शायरी, लेख, नाटक और कहानियाँ लिखते हैं। उन्होंने “ज़िंदगी – एक चलचित्र” नामक एक हिंदी कविता पुस्तक 2017 में प्रकाशित की और एक उपन्यास अंग्रेजी भाषा में  “Too Close – Too Far” के नाम से प्रकाशित है, और इसका हिंदी अनुवाद “बहुत करीब – बहुत दूर” के नाम से प्रकाशित है। एक व्यक्ति के रूप में, वह हमेशा खुद को एक शिक्षार्थी मानते है। उनके ही शब्दों में “एक लेखक सिर्फ दिलचस्प तरीके से शब्दों को व्यवस्थित करता है, पाठक अपनी समझ के अनुसार उनके दिमाग में वास्तविक रचना का निर्माण करते हैं और मेरी एक रचना की पाठकों के अनुसार लाखों संस्करण हो सकते हैं।” आज प्रस्तुत है उनकी एक लम्बी कहानी – अनकहा।)  

☆ कथा ☆ कहानी अनकहा

‘स्वीटी आज मुझे आने में थोड़ी देर हो जाएगी तो प्लीज मेरे आने का थोड़ा इंतज़ार कर लेना’ निशा जल्दबाज़ी में टिफिन में खीर पैक करते हुए अपने कामवाली से बोली।

‘हाँ मैडम कोई दिक्कत नहीं है, आप आराम से आना। मैंने अपने बच्चो के लिए आज दोपहर में ही रात का खाना भी बना दिया था और वो खा लेंगे। मैं आपके आने के बाद ही जाऊँगी’।

‘थैंक यू स्वीटी! तुम्हे पता है, तुम बेस्ट हो यार। लव यू’ उसने होठों को गोल करके उसके तरफ देखते हुए मजाकिया अंदाज़ में बोली।

‘ये प्यार मैडम आप आज साहब के लिए संभाल के रखिये। आज उनका ख़ास दिन है, आपके काम आएगा’ वो हॅसते हुए बोली और दोनों हॅसने लगे।

वो हल्के नीले रंग की सलवार सूट पहने हुई थी, गोरा रंग, पतली काया, बड़ी और चंचल आँखे और उसने अपने रेशमी बालों को मोड़कर आगे की तरफ कर रखा था। उसके चेहरे पर पड़ती रौशनी और उसके माथे की लाल बिंदी बेहद खिल रही थी।

वो जल्दी-जल्दी घर के सामने खड़े कैब में जाके बैठ गयी और ड्राइवर ने गाडी स्टार्ट कर दी। आज वो दिए वक़्त से पहले ही तैयार हो गयी थी। आखिर हो भी क्यों न आज उसके प्यार राहुल का जन्मदिन जो था।

निशा उससे बेहद प्यार करती थी, दोनों तीन साल से रिलेशनशिप में थे और दोनों जल्द ही शादी का सोच रहे थे। बस देर राहुल के जवाब का ही था। राहुल को थोड़ा करियर में सेटल्ड होने का वक़्त चाहिए था।

निशा तो बस जैसे राहुल के जवाब का ही इंतज़ार कर रही थी और उन सुनहरे सपनों की तैयारी में हर दिन लगी रहती थी। उसने तो कई चीजे खरीदना भी शुरू कर दिया था। आज उसने राहुल के लिए अपने शहर के एक प्रसिद्द होटल विराट में 2 सीट्स बुक कर रखे थे और बर्थडे की बात उसने होटल मैनेजर को बता रखी थी।

एक सरप्राइज पार्टी, क्यूकि ये राहुल का पसंदीदा जगह जो थी और तय समय था, शाम के 8 बजे। अभी शाम के 7 ही बजे थे और वो होटल मैनेजमेंट के तैयारियों का खुद से जायजा लेने वक़्त से पहले ही वहाँ पहुंच गयी थी।

मुंबई की भीड़ वाली ट्रैफिक में आज उसके किस्मत ने अच्छा साथ दिया था, और वो समय से पहले पहुंच गयी थी। आखिर वो कुछ भी कमी देखना नहीं चाहती थी, एक परफेक्ट बर्थडे पार्टी, अपने प्यार के लिए। उनका सीट्स होटल के प्रथम तल्ले पे एक कोने में था, जहाँ से होटल के अगले माले पे सभी आने-जाने वाले लोग दिख रहे थे।

निशा ने सीट्स बदलने की कोशिश भी करवाई लेकिन मैनेजर ने माफ़ी मांग लिया। होटल कर्मचारी सब कुछ तैयार करके चले गए लेकिन अभी भी 8 बजने में 50 मिनट्स और बचे थे और वो उससे पहले राहुल को कॉल करके परेशान नहीं करना चाहती थी।

इसीलिए निशा ने उसे एक मैसेज भेजा। ‘क्या तुम तैयार हो गए?’

‘क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?’ एक अनजान आदमी के आवाज़ ने निशा का ध्यान अपनी और खींचा। उभरी हुई भोहे, बाज की तरह नाक, समुद्री रोवर-नीली आँखे, गोरा बदन और तराशा चेहरा मानों कोई अभिनेता हो। सफ़ेद कमीज, नीला पैंट, और काले ओवरकोट में वो किसी भी लड़की का दिल धड़का सकता था।

‘माफ़ कीजिये पर ये 2 सीट्स मैंने पहले से बुक कर रखे हैं तो आप कही और बैठ जाइये’ निशा ने शालनीता से कहा।

‘हाँ पता है, लेकिन मुझे तो यही बैठना है और आपसे कुछ बातें करनी है, मेरा नाम आकाश है और मैं यहाँ अकेले ही आया हूँ और आप जैसी सुन्दर लड़की को इतने बड़े होटल में अकेले बैठा देख खुद को रोक नहीं पाया’ उसने मुस्कुराते हुआ कहा।

‘माफ़ कीजिये आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, पहली बात की मुझे अंजानो से बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं है और दूसरी की मैं यहाँ आपके तरह अकेले नहीं हूँ, मैं अपने बॉयफ्रेंड का इंतज़ार कर रही हूँ वो आने ही वाला है और अगर उसने आपको यहाँ देखा तो आप पक्का मार खाओगे’ निशा गुस्सा करते हुए बोली।

‘मरे हुए को कोई क्या मरेगा मैडम’ आकाश ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा ‘कृपया गुस्सा न हो, लेकिन असलियत में अभी तो आप अकेली ही हैं और मेरा विश्वास करे मैं आपको परेशान नहीं करूँगा। मैं आपके जवाब तक यही खड़ा रहूँगा’।

निशा उसके छिछोरी हरकत पे और उसे आने-जाने के बीच रास्ते में खड़ा देख गुस्से में कुछ बोलना ही वाली थी की तभी अचानक उसने राहुल को एक सुन्दर लड़की के साथ सीढ़ियों से उतरते हुए देखा, राहुल ने उसके कंधे पे अपना हाथ रखा हुआ था, वो दोनों मुस्कुरा रहे थे।

वो थोड़ी चौंक सी गयी। फिर उसे लगा की शायद राहुल उसे ढूंढ रहा हो और वो लड़की भी उसके साथ आयी हो। लेकिन वो दोनों होटल के बाहर जाने लगे। निशा ने उन्हें अपनी तरफ बुलाने, वापस बैग से अपना फ़ोन निकाला तो देखा कि राहुल का एक मैसेज आया हुआ था।

‘माफ़ करना निशा! लेकिन मेरी तबियत अचानक थोड़ी ख़राब हो गयी है तो मैं वहाँ नहीं आ सकता। कुछ देर पहले मैंने दवाई ली है और अभी सोने जा रहा हूँ। अभी तो लगभग एक घंटा बचा है तो कॉल करके होटल वालो को मना कर दो। मैं तुमसे कल मिलता हूँ। सॉरी!’

मैसेज देखके तो जैसे निशा के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। ऐसा झूठ, ऐसा धोखा, आखिर क्या कमी रह गयी थी उसके प्यार में? उसकी हालत तो जैसे काटो तो खून नहीं। एक पल में जैसे सारे सपने कांच ही तरह टूट के बिखर गए। अचानक लगा जैसे उसका सब कुछ छिन गया हो और वो बिलकुल अकेली हो गयी हो, ये शहर सहसा उसे अजनबी लगने लगा था।

वो धम्म से कुर्सी पे बैठ गयी, अथक कोशिशों के बावजूद भी वो अपने भावनाओ पे नियंत्रण नहीं रख पायी और उसके बड़े-बड़े आँखों से जैसे आंसुओं की धारा निकल पड़ी। निशा की ऐसी हालत देख सहसा आकाश उसके नजदीक आ गया और उसे जोर से टोकते हुए बोला।

‘क्या आप ठीक है मैडम? थोड़ा पानी पीजिये’।

‘हाँ! क्या? तुम कौन हो?’ निशा धीरे से हड़बड़ाते हुए बोली।

‘मैं बोला, आप पानी पीजिये, मैं आकाश! जो आपके इंतज़ार में कबसे खड़ा है’ आकाश शालीनता से बोला।

‘ओह! माफ़ करना मैं थोड़ी सी चौक गयी थी। और हाँ अब तुम यहाँ आराम से बैठो, मैं जाने ही वाली हूँ’ निशा मुस्कुराते हुए बोली।

‘कृपया ऐसा न करे, मैं तो ऐसे ही अकेले इधर-उधर भटकता रहता हूँ, लेकिन मेरी वजह से आप न जाए, आप यही बैठे, मैं चला जाता हूँ’ आकाश बोला।

कुछ पल के लिए वह ख़ामोशी का माहौल रहा फिर निशा बुदबुदायी ‘वजह कुछ और है’।

मैं समझ सकता हूँ, विगत कुछ मिनटों में यहाँ क्या हुआ है, मैं उसे महसूस कर सकता हूँ’ वो मुस्कुराते हुए बोला।

‘तब तो तुम्हे बहुत ख़ुशी हुई होगी’ निशा झल्लाते हुए बोली।

‘नहीं दिखने में तो वो लड़की जिसे आप घूर रही थी, ज्यादा सुन्दर थी। लेकिन मुझे तो आपसे ही बात करना था इसीलिए तो आपके पास आया मैं’ आकाश ने चुटकी लेते हुए कहा।

‘अच्छा तो फिर तुम मेरे पास क्यों आये हो? कहीं और जाके मरो’ वो गुस्से मैं बोली।

‘नहीं आपमें कुछ अलग दिखा मुझे, इसीलिए आपके पास आया’ आकाश मुस्कुराते हुए बोला।

‘और ये बात तुम आज तक कितनी लड़कियों को बोल चुके हो?’ वो झिड़की।

‘ईमानदारी से बताऊँ तो कल तक की गिनती तो मुझे याद नहीं है, लेकिन आज पहली बार किसी को बोला हूँ’ उसने उसके आँखों में देखते हुए मजाकिया अंदाज़ मैं बोला।

‘अच्छा तो मेरे रोने के बात को छोड़ तुम्हें, मुझमें ऐसा क्या ख़ास बात दिखी आज?’

‘रोने को तो मैंने गिना ही नहीं था क्यूंकि वो तो मेरा रोज का है। लेकिन 8 बजे का बुकिंग करके 1 घंटे पहले पहुंचना, इतने बड़े होटल में इतने प्रोफेशनल कर्मचारियों से ज्यादा मेहनत करवाना, ऐसे आधुनिक जगहों में ऐसे पारम्परिक कपड़ो और मेकअप में आना, इतने टेस्टी खाना के बावजूद घर से कुछ टिफ़िन में लेके आना, ये तो मुझ जैसे बेवकूफ का भी ध्यान खींच सकती है’ वो बोला।

उसके बोलने के अंदाज़ से निशा की भी हंसी छूट गयी। वो आंसू पोछते हुए बोली।

‘जब तुम सब समझ ही गए हो तो बैठ जाओ, अब इतना खर्च करके खाली पेट घर जाने में तो बेवकूफी होगी। वैसे भी मुझे अब एक नयी शुरुआत करनी है तो क्यों न अच्छे से किया जाय’

‘आपने तो मैडम मेरे मुँह की बात छीन ली। अभी जो आपके साथ हुआ उसे भूलके आगे बढ़ जाइये, आप जैसी लड़की को ऐसे लड़को के लिए आंसू बहाना अच्छा नहीं लगता। आप जैसी है, वैसी बहुत अच्छी हैं, तो नयी शुरुआत कीजिये बिलकुल अपने तरीके से। और अभी जल्दी से कुछ आर्डर कीजिये, कहीं भूख से आप और दुबली न हो जाए। मैं तो अकेले था तो बोरियत मिटाने बहुत सारा खाना खा चुका और अब भूख है नहीं। आप बताइये क्या खाएंगी आप?’ वो बोला।

‘वैसे तो मुझे ये जगह कुछ ख़ास पसंद नहीं, लेकिन पैसा लग गया है, तो बहुत सारा खायूँगी, 2 आदमी का खाना अकेले जो खाना है’ वो गहरी सांस लेते हुए बोली, उसकी नकली मुस्कान साफ़ साफ़ झलक रही थी। उसने वेटर को बुलाकर खाने का आर्डर दिया। वेटर के जाने के बाद वो बोला।

‘कोई बात नहीं आप आराम से खाये, मेरे पास भी समय की कोई कमी नहीं है’ ‘इसके बाद बताये कहाँ जाया जाय, जिससे आपकी नकली मुस्कान असली में बदल जाय।

‘ठीक है खाके सोचते हैं। वैसे देखके तुम ठीक-ठाक घर के लग रहे हो और तुम्हारी उम्र 30-35 साल तो लग रही है। तुम क्या अभी तक अकेले हो?’ उसने जिज्ञासावस पूछा।

‘नहीं मैं बीवी-बच्चो वाला आदमी हूँ, लेकिन मैं उनके साथ नहीं रहता और चाह के भी नहीं रह सकता। वैसे मेरी उम्र का आपका अंदाज़ा तो लगभग ठीक है, लेकिन मेरी उम्र लगभग रुक सी गयी है, वहीं प्रकृति का स्पर्श’ उसने मुस्कुराते हुए कहा।

‘मतलब तुम जैसा खुले दिल वाला इंसान भी नकली मुस्कान देता है’ निशा गंभीरता से बोली।

‘इंसान कैसा भी हो लेकिन कुछ चीजों को लेके हमेशा गंभीर रहता है, खैर छोड़िए इसके बाद हमलोग अच्छी जगह चलते हैं। ताकि कोई बेमन से न हँसे’ वो धीमे स्वर में बोला।

‘पहले तो मैं घर लेट जाती, लेकिन अब मैं थोड़ा जल्दी घर जाने का सोच रही हूँ। मेरी बाई मेरे घर पे मेरे इंतज़ार कर रही होगी और उसके घर पे उसके 2 बच्चे उसके आने का राह देख रहे होंगे। मेरे घर जल्दी जाने से वो जल्दी अपने बच्चो के पास जा पायेगी’ निशा थोड़ा रूककर बोली।

‘अच्छा लगा जानकार की आप एक कामवाली बाई का इतना ख्याल रखती हो’। आकाश गहरी सांस लेते हुए बोला।

‘वो भी मेरा बहुत ख्याल रखती है। उसके ऊपर उसके दो बच्चों की जिम्मेदारी है और वो इसे बखूबी निभा रही है। बेचारी का पति एक कार दुर्घटना में मारा गया। उसकी कार दुर्घटना के बाद पुल से टकराते हुए नदी में गिर गयी और डूबने से उसकी मौत हो गयी। भगवान ऐसी मौत किसी को न दे’ निशा ने उदासी भरे स्वर में कहा।

‘हाँ सही बोली, ऐसी मौत भगवान किसी को ना दे। उसने कितना प्रयास किया होगा ना, बाहर निकलने का, मौत से लड़ने का, ज़िन्दगी से विनती एक दूसरे मौके का’ उसने गम्भीरता से बोला।

‘हाँ! लेकिन उसके जाने के बाद असल कष्ट तो उसके परिवार को हुआ है। खैर, मैंने इतना कुछ सुना दिया अब तुम्हारी कहानी भी थोड़ी सुन लिया जाए’ निशा बोली।

‘हाँ क्यों नहीं! यहाँ से हम मेरे खुले कार में एक छोटी से ड्राइव पे चलेंगे, अपना पहला स्टॉप होगा सिनेमैक्स सिनेमा के बहार वो फेमस वृंदा चाय स्टाल, वहाँ से मस्त मसाला चाय पिएंगे फिर आपको घर छोड़ दूंगा ताकि आपकी बाई खुश होक जल्दी घर जा सके और और हाँ चिंता मत कीजिये, मेरे रहते आपको कोई खतरा छू भी नहीं सकता है। आप दोनों को खुश करना अब मेरे जिम्मे है, शायद इसीलिए भगवान ने मुझे यहाँ भेजा है। आपलोग खुद को कभी अकेला महसूस मत करना’ वो मुस्कुराते हुए बोला।

निशा ने बर्थडे का केक घर ले जाने के लिए पैक करवा लिया था। खाना खत्म होने के बाद निशा ने बिल चुकता किया फिर वो दोनों होटल से बहार निकल गए। पार्किंग में आकाश ने आगे बढ़कर निशा के लिए हुए गाडी का दरवाजा खोला। वो मुस्कुराते हुए गाडी में बैठ गयी।

फिर आकाश ड्राइवर सीट पे बैठके गाडी स्टार्ट कर दी। रात के 9 बज गए थे और खुले कार में तेज़ आती हवा से थोड़ी ठण्ड महसूस हो रही थी। आकाश ने ट्रैफिक काम करने की वजह से थोड़े खाली रास्ते से गाडी को ले जाने लगा। ठन्डे हवा के थपेड़ो और गाड़ी में बजते सुरीले गीतों से निशा का मन हल्का हो गया था, वो काफी अच्छा महसूस कर रही थी और मुस्कुराते हुए आकाश को शुक्रिया बोली, आकाश बदले में उसकी तरफ देखके मुस्कुराया। थोड़ी देर में वो चाय स्टाल के पास पहुंचे। कार ठीक चाय स्टाल के सामने रुकी जिस तरफ निशा बैठी हुई थी। निशा ने कार के अंदर से ही 2 चाय का आर्डर दिया। चाय मिलने पे उसने एक चाय आकाश के तरफ बढ़ाया। चाय पीने के बाद निशा ने पैसे दिए, अपना पता बताया और आकाश ने कार स्टार्ट कर दी।

‘अब मुझे अपनी कहानी सुनाओ और तुम अपने परिवार से अलग क्यों रहते हो?’ निशा ने अनुरोध किया।’

‘मैं एक बहुत की गुस्सैल और हठी आदमी था’ आकाश बोला।

‘लेकिन तुम्हे देख के ऐसा बिलकुल नहीं लगता’ निशा बोली।

‘वक़्त बहुत कुछ बदल देती है। मैंने जो गलती की, उसकी सजा मेरा परिवार भुगत रहा है। मेरी बीवी दूसरे के घर काम करके परिवार चलाती है। दिखावा और आधुनिक चकाचौंध में, मैं वास्तविकता से दूर हो गया था। साधारणता ही सबसे प्यारी और ख़ास चीज है, मैं ये समझ नहीं पाया। मैं उसके प्यार को समझ ही नहीं पाया, नासमझी में मैंने अपनी बीवी का बहुत दिल दुखाया है।

मैं गुनहगार हूँ। उससे जुदा होने के बाद आज तक ऐसा कोई दिन नहीं गुजरा जिस दिन मैं रोया नहीं हूँ’ आकाश ने बोला और एक गहरी सांस ली।

‘तुम्हे अपनी गलती का एहसास है, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है, तुम अभी भी चीजे ठीक कर सकते हो’ निशा गंभीरता से बोली।

लेकिन ये ज़िन्दगी कुछ भूल को सुधारने का दूसरा मौका नहीं देती। मैं बहुत आवारा था। पुरे दिन दोस्तों के साथ इधर -उधर घूम कर आवारागर्दी किया करता था। ना पढ़ने की सुध होती थी और नहीं कभी कुछ करने की। मैंने जैसे-तैसे पढाई पूरी की, वो तो मेरे पिता जी की कृपा थी जो मुझे उनका एक बना बनाया बिज़नेस मिल गया।

उनका ऑफिस शुरू कर तो मेरे पास पहले से ज्यादा पैसे आने लगा और मैं वो पैसे जम के खर्च करता था। मैं अपनी ज़िन्दगी को अच्छे से जीना चाहता था, मैं सोचता था की आखिर इंसान इस दुनिया से लेके क्या ही जाता है, तो जो है, यही खुल के जियो।

मेरी आदतों से घर वाले नाखुश रहते थे और उन्होंने मुझे सुधारने, मेरी शादी अपने पसंद के एक लड़की से करवा दी। मेरी बीवी का नाम पल्लवी लेकिन मैं उसे प्यार से स्वीटी बुलाता था, ये नाम उसे पसंद नहीं था और वो इस नाम से थोड़ा चिढ जाती थी, लेकिन मुझे अच्छा लगता था तो मैं उसे वही बोलता था।

वो देखने में बहुत सुन्दर थी, वो दूधिया गोरा रंग, तराशा शरीर, समंदर जैसी गहरी आँखे, खुद से बेखबर वो, जब मैं उसे देखता तो मन करता था की सब कुछ छोड़ के उसे ही निहारता रहूं। पहली बार मुझे प्यार का एहसास कराया था उसने। वो मेरा और परिवार का बहुत ख्याल रखती थी, एक आदर्श भारतीय नारी की तरह।

किसी को जरा सा कुछ हो जाए तो वो सब कुछ भूल जाती थी, भगवान से प्रार्थना, सबकी सेवा, जैसे उसने अपना सब कुछ परिवार को समर्पित कर दिया था। उसके आने से मेरी ज़िन्दगी बदलने लगी थी। शुरुआत के कुछ महीने बहुत अच्छे गए लेकिन धीरे-धीरे चीजे बदलने लगे।

मेरे दोस्तों में मेरी अलग सी पहचान थी, एक मन-मौजी, मस्तीखोर लड़का। लेकिन मेरी बीवी के आदतों से, मैं उन सब चीजों से दूर होने लगा। मेरे दोस्त मुझे चिढ़ाने लगे थे और धीरे-धीरे मुझे लगने लगा जैसे मेरी आजादी छिन गयी हो।

मैं बहुत खर्चीला था और वो हमेशा पैसा बचाने का सोचती थी, वो बहुत साधारण ज़िन्दगी जीती थी, भविष्य की चिंता करती थी, तो वही मैं अपने वर्तमान में जीना चाहता था। उसके वजह से मेरा महंगे जगहों पे आना जाना बंद हो गया मेरे शौक पूरे होने बंद हो गए।

लगा जैसे की एक दुनिया से मेरा वास्ता खत्म होने लगा था जिसे मैं जीना चाहता था। मैं उसके बचत और साधारण आदतों से परेशान होता गया। जैसे-तैसे शादी के 5 साल पूरे हुए, हमारे 2 प्यारे बच्चे भी हुए, लेकिन वक़्त के साथ हमारी नोक-जोक और झगडे बढ़ते गए।

इसी बीच मेरे माता-पिता का निधन हो गया था और मेरे ऊपर से एक बना दवाब भी दूर हो गया था, मेरी मनमानी बढ़ती गयी। धीरे-धीरे मैं अपनी बीवी से कटने, दूर रहने का प्रयास करता रहता था। इधर मेरे ध्यान न देने से हमारा बिज़नेस भी ठप होने लगा, लगातार नुकसान होते गए, लेकिन मेरा ध्यान इस तरफ बिलकुल नहीं जा रहा था।

मैं अक्सर घर देर से लौटने लगा, कभी-कभी तो 2-3 दिन बाहर ही रहता। मैं अपनी बीवी का सामना करने और उसके उपदेशो से बचना चाहता था, मैं उससे झूठ बोलने लगा था। हमारी बातें भी बहुत कम होती थी। चीजे धीरे-धीरे बाद से बदतर होती गयी।

और जब सब खत्म हो गया, वो तारीख थी 6 अप्रैल 2017। उस दिन निशा का जन्मदिन था, और मैंने अपने दोस्तों को एक तगड़ी पार्टी देने का वादा किया था। मैंने ऑफिस से अपनी बीवी को कॉल करके अच्छे से तैयार रहने बोला था मॉडर्न तरीके से, एक गर्लफ्रेंड की तरह, जैसे मेरी दोस्त लोगों की बीवी रहती हैं।

मैंने उसे बोला की शाम के 7 बजे कहीं बाहर खाने ले जाऊंगा। बच्चो का मैंने उसे बोला की आज पड़ोसी के निगरानी में छोड़ दे। मैं ठीक समय पे घर पहुंच गया तो देखा की मेरी बीवी तैयार नहीं थी। मैं उस दिन कोई झगड़ा नहीं चाहता था और अपनी बीवी के जन्मदिन को ख़ास बनाना चाहता था।

मैंने पार्टी में अपने कई दोस्तों को भी बुलाया था, लेकिन सिर्फ नौजवान जोड़े आ सकते थे। मैं अपने दोस्तों में अपनी धाक बनाये रखना चाहता था। और इधर मैं पार्टी देके अपनी बीवी को भी खुश करना चाहता था, लेकिन परिणाम ठीक विपरीत हुआ। उसे मेरी तैयारी पसंद नहीं आयी। वो खुश होने के वजह उल्टा गुस्सा हो गयी और फिर हमारी लड़ाई शुरू।

वो बोली घर के बजट के अनुसार यही कुछ करते हैं। मैं खाना बना दूंगी, आप अपने दोस्तों को भी घर पे बुला लो। मैंने उसके जन्मदिन के लिए ही सब कुछ किया था और उससे ही लड़ना पड़ रहा था, मैं ये सोच के बहुत गुस्सा हो गया। मैंने उसे घर पे रहने बोला और गुस्से में, अकेले गाडी में बैठ के घर से निकल गया।

मैं अपने बुलाये दोस्तों को निराश नहीं करना चाहता था। मैंने अपनी बीवी-बच्चो को उन दोस्तों के लिए छोड़ दिया जो बाद में मेरा जिक्र तक नहीं करते। खैर उस वक़्त मैंने गुस्से में कार तेज़ी से होटल के तरफ ले जाने लगा और फिर’ आकाश बोला और गाड़ी रोक दी, फिर एक गहरी सांस लेके उसने अपनी नम होती आखें मली।

फिर क्या हुआ?’ निशा जिज्ञासावस पूछी।

‘आपका घर आ गया’ आकाश बोला।

‘क्या?’ निशा झट से बोली।

‘अरे मैडम! अपने बायें देखिये आपका घर आ गया है, अब उतरिये। शुभ रात्रि’ वो मुस्कुराते हुए बोला।

‘ओह। माफ़ करना मैं तो तुम्हारे कहानी में खो ही गयी थी। तुम तो मेरी सोच के एकदम विपरीत निकले। लेकिन ये कहानी तो अधूरी ही रह गयी और मुझे ये कहानी पूरी सुननी है।’ निशा ज़िद करते हुए बोली।

‘कुछ कहानियाँ हमेशा अधूरी ही रहती है मोहतरमा! हम उसे चाह कर भी पूरी नहीं कर पाते, ना बदल पाते हैं। ऐसी कहानियाँ, कुछ अनसुने-अनकहे लफ़्ज़ों में सिमटा हुआ, सुबकता-बुदबुदाता रहता है, और ऐसी कहानियाँ सुनी और समझी नहीं बल्कि महसूस की जाती है। खैर, अब आप अपने घर जाएँ’ आकाश गहरी साँस लेते हुए बोला।

निशा बेमन से गाडी से उतर गयी, उसने देखा की पड़ोसी का कुत्ता उन्हें देख कर जोर-जोर से भौंक रहा था, जैसे वो अपना बंधा रस्सी तोड़ देगा, तभी उसकी नज़र कार के अगले हिस्से पे पड़ी एक बड़े निशान पे पड़ी, वो चौंकते हुए बोली। ‘ये इतने सुन्दर गाड़ी में इतना बड़ा निशान कैसा? लगता है जैसे हाल में कोई हादसा हुआ हो’

‘हाँ! एक छोटे से हादसे का ही निशान है’ वो धीरे से बोला।

पड़ोसी सब बाहर ना आ जाएं, इसीलिए निशा ने भौंकते कुत्ते को पुचकारकर चुप करवाने का प्रयास करने लगी, तो देखा कुछ ही पलों में वो चुप हो गया। उसके चुप होते ही जब उसने पलटकर आकाश को देखा, तो देखा वहाँ कोई नहीं था। ये सब देख निशा को थोड़ा अजीब लगा। एक अजीब सी ख़ामोशी चारों और फैल गयी थी।

वो दो कदम आगे ही बढ़ी थी की आकाश के आखिरी कहे शब्द से वो अचानक ठिठक कर रुक गयी। उसके चेहरे के भाव जैसे बदलने लगे, कुछ अनकहे बातों ने उसे बहुत कुछ सोचने पे विवस कर दिया था। झींगुरों की आवाज़ और गहराते रात के सन्नाटे में, उसके दिमाग में कई सारे सवाल घूमने लगे।

स्वीटी और वो अजनबी? कार हादसा और गाड़ी का निशान? मेरी बाई और उसकी बीवी? उसकी बातें, उसके भाव, उसका मेरा ख्याल रखना और अपने गाड़ी में मुझे घर तक छोड़ना ताकि स्वीटी जल्दी घर पहुंच सके और सब खुश रहे? 2 कहानियाँ और मैं? क्या सब आपस में जुड़े हुए हैं? और वो, जो कुछ देर पहले मेरे साथ था वो कौन था? पछतावा के आँसू रोता एक बेबस इंसान या एक मददगार रूह?

वो कुछ पलों तक रूककर सोचती रही फिर अचानक मुस्कुरा पड़ी, उसके चेहरे पे उमड़ते भावों से लग रहा था, जैसे उसने कोई बड़ी उपलब्धि पायी हो, लगा जैसे उसके तन-बदन में एक नयी ऊर्जा का संचार हुआ हो, वो ख़ुशी से गाना गुनगुनाते और झूमते हुए अपने घर के तरफ बढ़ी।

फिर वहाँ जाके उसने घर का कॉल-बेल बजायी तो उसके बाई ने दरवाज़ा खोला। दरवाजा खुलते ही उसने झट से ख़ुशी में कसकर उसे गले लगा लिया।

‘अरे मैडम आप इतनी जल्दी आ गयी। क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?’ स्वीटी मुस्कुराते हुए आश्चर्यचकित होकर पूछी।

‘सब ठीक है, और अब हमारे साथ सब अच्छा ही होगा, हम बहनें कल बात करते हैं, अभी तुम जल्दी से अपने घर जाओ और ये खीर और केक बच्चों को खिलाना, वो खुश हो जायेंगे’ निशा मुस्कुराकर खीर का टिफ़िन और केक का डब्बा देकर उसे विदा करते हुए बोली।

‘हाँ मैडम वो बहुत खुश होंगे। शुक्रिया। अब आप घर अंदर से बंद कर लीजिये, मैं कल सुबह आती हूँ, शुभ रात्रि’ वो मुस्कुराकर बोली।

‘शुभ रात्रि, स्वीटी’

©  श्री दिव्यांशु शेखर 

दिल्ली

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈
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