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डॉ विनोद गायकवाड जी के पुरस्कृत मराठी उपन्यास ” युगांत ” का डॉ प्रतिभा मुदलियार जी द्वारा हिंदी भावानुवाद 

अमेज़न लिंक >>>>> युगांत (मराठी)

(महाभारत के चरित्र भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित सुप्रसिद्ध मराठी उपन्यास)

डॉ विनोद गायकवाड

 

 

 

डॉ.विनोद गायकवाड़ जी मराठी के एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं। आपने पचास से अधिक उपन्यासों की रचना की है।  महाभारत के चरित्र भीष्म  पितामह पर आधारित उपन्यास “युगांत” ने कई पुरस्कार जीते हैं।हाल ही में आपने  शिरडी के साईं  बाबा के जीवन पर आधारित मराठी में “साईं” उपन्यास लिखा है जिसे पाठकों का भरपूर प्रतिसाद मिला है। आपका संक्षिप्त साहित्यिक परिचय निम्नानुसार है –

उपन्यास – 54 उपन्यास
सुप्रसिद्ध उपन्यास –

  • साई – (शिर्डी साईबाबा के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, अङ्ग्रेज़ी, हिन्दी, कन्नड, तमिल, गुजराती व कोंकणी भाषा में अनुवाद
  • युगांत – (भीष्म पितामह के जीवन पर आधारित रोमहर्षक कथा) मराठी, तमिल, हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित
  • युगारंभ – (महात्मा फुले व सवितरिबाई फुले के जीवन पर आधारित कथा ) मराठी, कन्नड व अङ्ग्रेज़ी में अनुवादित

कथा – 200 से अधिक प्रसिद्ध कहानियाँ , चार कथा संग्रह। “साप साप” कथा कर्नाटक सरकार के पाठ्य पुस्तक का भाग
नाटक – 7 नाटक प्रकाशित
समीक्षाएं – 6 समीक्षाएं प्रकाशित
संशोधनात्मक/ आलोचनात्मक लेख – 50 से अधिक
साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित अनुवाद – समकालीन कन्नड कथा
शोध – आपके कृतित्व “विनोद गायकवाड के उपन्यासों का अध्ययन (मराठी)” शीर्षक पर पी एच डी पूर्ण एवं “साई”“युगांत “पर पी एच डी पर कार्य चल रहा है।

सम्प्रति – प्राध्यापक (मराठी विभाग), रानी चन्नम्मा विद्यापीठ, बेलगांव (कर्नाटक)

डॉ प्रतिभा मुदलियार

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

☆ “युगांत” अध्याय-1-गंगा भाग-5 ☆

(हम डॉ विनोद गायकवाड जी एवं डॉ प्रतिभा मुदलियार जी के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमें अपनी अप्रकाशित कृति “युगांत” को ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। आप यह कृति प्रतिदिन धारावाहिक के रूप से आत्मसात कर सकेंगे। )

संभवतः सूर्य कालरथ का दिव्य चक्र ही होता होगा।

राजा प्रतीप से मिलने के बाद कितना ही समय गंगा के पानी की तरह बह गया था और  इस धरती पर कई सारी घटनाएं भी घटित हो गयी थी।

स्मृति विस्मृति की रेखा पर मैं भी कालक्रमणा कर रही थी। श्रापसमय की प्रतीक्षा कर रह थी। श्राप भोगने से भी अधिक उस क्षण की प्रतीक्षा करना  भयावह होता है, इसका अनुभव मुझे हो रहा था।

कैसा विचित्र जीवन है मेरा!

मैं चिरयौवना।

नित्यतरुणी।

यौवन से भरी मेरी देह कभी मुरझाती नहीं। निर्माल्य नहीं होती।

किंतु…

किंतु आजकल मेरे मन को एक प्रश्न सतत सालजा जा रहा है.. चिरयौवना होने का यह वरदान जो मुझे मिला है वह सचमुच वरदान ही है ना या फिर वरदान की आड़ में अभिशाप ? अमृतकुंभ में छिपा हालाहल?  सौंदर्यसंपन्न देह में छुपा असुंदर ह्रदय? सच में क्या होगा?

यौवन है और वह भी चिरस्थायी है। नित्य और सतेज। इसलिए उसमें से कामज्वाला उफनती रहती है। काम से मोह प्रकट होता है और मोह की अग्नि में की राख होती है और फिर शापदग्ध जीवन जर्जर हो जाता है।

यौवन… कामभाव.. मोहावस्था… शापदग्धता.. मृत्युलोक…

जीवन ..

दुःख! यातना!

मृत्यु… मुक्ति….

जिसे सारा संसार आनंदनिधान कहता है उस चिरयौवन से इतनी वेदनाएं ह्रदय में जतन करनी होती है… यह कैसा महादैवीदुर्विलास है?

काल दौड़ रहा है।

पथ्वी पलट रही है।

तूफान उठते हैं.. शांत होते हैं।

पर मैं, मेरा यौवन, मेरा लावण्य सब स्थिर.. और उसके पीछे का असीम कारुण्य, प्राणों की कश्मकश लेकिन उतनी ठोस।

मेरी समझ में ही नहीं आता कि मेरा यह यौवन चिरस्थायी है या यह विक्राल वेदना?  इतना अप्रतिम लावण्य होने पर भी  उसका अधिक्षेप क्यों? ब्रह्मदेव के अभिशाप से मेरा और महाभिष का मिलन तो होनेवाला ही है। फिर भी मुझे प्रतीप का मोह क्यों हुआ होगा?  त्रिलोकपथगामिनी मैं भला क्यों बार बार अपना रास्ता भटक रही हूँ? पथभ्रष्ट क्यों हो रही हूँ?

अचानक मेरे शीश के ऊपर से एक बहुत बड़ी छाया सरक गयी और मैं एकदम होश में आयी। विचारों की कड़ी टूट गयी।

मेरी दृष्टि ऊपर की ओर  गयी। आसमान से एक कृष्णमेघ अपनी ही मस्ति में लहराता जा रहा था। पक्षियों का एक झुंड प्रसन्नता से  छलांग लगा रहा था। स्वच्छ प्रकाश में उनकी परछाइयाँ मन को मोह रही थी। वातावरण की रमणीयता  से मैं खुश हो रही थी, प्रसन्नचित्त हो रही थी।

मुझे समीप के जंगल से वनफूलों की मदहोश करनेवाली सुगंध हवा की लहरियों से आने का अनुभव हुआ। मेरे गुलाबी नथुने रोमांचित हुए।  मैं उन वनफूलों की सुगंध से पगलायी और अनजाने में मेरे कदम परिमल के सहारे फूलों को ढूँढने के लिए जल्दी ज्लदी बढ़ने लगे। घने हरे पर्णसंभार को हाथों से दूर करते हुए मैं जंगल में आयी। गंगा नदी पास में ही बह ही थी।  उसकी मधुर झरझर  वातावरण में आल्हाद निर्माण कर रही थी।

बीच बीच में सुखी घास के कुचलने की चर्रचर्र आवाज़ आ रही थी।

अरअराकर वृक्ष की एक शाखा नीचे गिर पड़ी। पत्तों की सरसराहट क्षण भर के लिए हुई और अचानक उस घटना से मैं स्तब्ध हो गयी।

हड़बड़ायी।

और मैं वह दृश्य देखकर चीखी।

चिल्लायी।

एक बलशाली व्याघ्र अपनी पीली देह पर काली रेखाएँ घारण कर इतराता हुआ मेरे पास से ही आगे की ओर छलांग मार कर विद्युतलता के समान जंगल में गायब हो गया। व्याघ्र होकर भी किसी से तो घबराया था। उसके आविर्भोवों को देखकर उसकी भयभीत स्थिति को मैंने समझ लिया था और तुरंत ही उसका कारण मुझे मालूम पड़ा।

एक अत्यंत भव्य पुरुष हाथ में धनुषबाण लेकर व्याघ्र के पीछे दौड़ता हुआ वहाँ आया था। किंतु उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और वह वहीं रुक गया। उसकी गति शीथिल हुई। रुक गयी। व्याघ्र वध का हेतु ही लुप्त हो गया था। वह एकटक मेरी ओर देखने लगा था।

मेरा ह्रदय धडकने लगा। और फिर मेरे ह्दय की धड़कन रुक सी गयी। ह्रदय में कई वनफूल खिल गए।  सारी काया रोमांचित हो गई थी। पैर का अंगूठा मिट्टी में धंसाते हुए मैंने उस पर नेत्र कटाक्ष डाला।

और वह सूर्य के समान वीर पिघल गया।

वह धनुर्धर एकदम सुंदर था। पौरुष से परिपुष्ट।

उसकी पुष्ट देह से नज़र हट ही नहीं रही थी। उसकी देह ऊँची पूरी और भव्य थी। उसके कंधे वृषभ के समान पुष्ट थे।

उसकी मुद्रा रत्न की तरह  स्वयंभू और तेजःपुंज थी और उसके नेत्र अर्थात् साक्षात् रत्न ही थे। महासर्प के नयनों का सम्मोहन उसके  नेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। वे नेत्र मेरे सर्वांग को अदृश्यरूप से सहलाते जा रहे थे।  इस कारण मेरी लावण्य से परिपूर्ण परिपुष्ट काया और भी रोमांचित हुई। विलोभनीय  नज़र आने लगी।  मेरी देह के नयनरम्य  ऊभारों  को निहारने में वह तल्लीन हो रहा था। मेरे उरोभाग में तूफान उठा और मैं मस्त हो उठी।

“हे स्वर्गलोक की सुंदरी…” उसकी दमदार आवाज़ मेरे कान पर पड़ी। मैं उसके राजसी चेहरे पर नज़र स्थिर कर रही थी।

“ तुम वनदेवी हो?  या व्योम देवता ? या सागर परी हो ?  यह असमान्य लावण्य भूलोक का नहीं है।… क्या मैं इस अतुलनीय सौंदर्यस्वामिनी का नाम  जान सकता हूँ ?”

“ गंगा.. “। मैंने कहा। “राजन… आप कौन हैं ”?  जिस तरह वह व्याघ्र भयभीत होकर भाग गया उससे तो यही लगता है कि आप एक श्रेष्ठ वीर है। आपका राजसी रूप  आपके सम्राटत्व की साक्ष देता है। आपकी ब्रह्मकमल सी विकसित मुद्रा आपके अंतःकरण की असीम प्रेमभावना व्यक्त करती है।… तो भी आपका नाम यह दासी जान पायेगी”?

“तुम्हारा यह विनय नम्रता को भी लजानेवाला है। तुम्हारे लावण्यपूर्ण व्यक्तिव में सौंदर्य और सारस्वत का मिलन हो गया है। हे गंगे, इस देह को राजा शांतनु कहा जाता है। क्षमा…किंतु… मैं सचमुच…. ”

“बोलिए राजन….”

“मैं प्रेम विह्वल हो गया हूँ। व्याकुल हो गया हूँ। गंगे.. मुझे ह्रदय से ऐसी प्रेरणा हो रही है कि .. तुम्हारी और मेरी भेंट इसके पहले ही हो गयी है। ऐसा मुझे निश्चित लगता है। ” शांतनु ने कहा।

और मैं चौंक गयी।

पूर्वस्मृतियाँ जाग गयीं। तो भी मेरी चित्तवृत्तियाँ उतनी ही ताजा थीं।

‘राजन….’

“ हाँ, प्रिये बोलो.. अब मैं तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मेरे प्रेम का तिरस्कार मत करना। स्वीकारों… प्रियतमे… निर्मल गंगे… ”

मौं सावधान हुई।

मोहपाशों को दूर किया।

“मैं तुम पर अनुरक्त हूँ। आपके चरण कमलों की दासी बनने का भाग्य यदि मुझे मिल जाय तो मैं स्वयं को भाग्यशाली समझूँगी।.. किंतु,…” मैं रुक रुक कर बोली। प्रत्येक क्षण को वे अधीर, आतुर  हो रहे थे। उनकी आँखों में प्रेम का कहर मचा था।

“प्रेम देवी… किंतु क्या? बोलो.. मैं तुम्हारे प्रेम के लिए सागर को पी जाऊँ या आकाश को भस्म कर दूँ ?  हिमालय को चूर्ण करूँ या खुद ही ऊँची चोटी से गहरी खाई में छलाँग लगा दूँ ? ..रानी तुम्हारे लिए यह सम्राट अपना सारा साम्राज्य धुलिकन की तरह फूँकने के लिए तैयार है।.. आज्ञा दो”।

“राजन ..“ मैंने अपनी भावविह्वलता को दूर कर दृढ़ता से कहा, “ मैं आपसे विवाह करने के लिए तैयार हूँ। पर उसके पहले मेरी कुछ शर्ते आपको माननी पडेंगी…”

“मुझे तुम्हारी हज़ारों शर्तें मान्य हैं ।” मृगशावक के समान उत्साह से उन्होंने कहा।

“ नहीं राजन.. मेरी शर्ते बहुत कम हैं किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनका पालन अगर यथायोग्य नहीं हुआ तो भविष्यकाल आपको क्षमा नहीं करेगा।” मैंने अपने वक्षस्थल का वस्त्र ठीक करते हुए कहा। हवा तेज चल रही थी। पत्तों की सरसराहट बढ़ रही थी और हमारे ह्रदय की धडकन भी।

वे कुछ अस्थिरचित, विचलित से लगे। किंतु बाद में कहा, “ देवी अपनी शर्ते बताइए…”

“ठीक है… विवाह के बाद मैं आपकी हर बात सुनूंगी ही ऐसा नहीं है। कुछ मैं स्वेच्छा से करूँगी। आपके कोई बंधन नहीं मानूँगी। आप मेरे किसी भी कृत्य पर कुछ भी नहीं कहेंगे। मैं क्या और क्यों कर रही हूँ यह प्रश्न जिस दिन आपके मुख से निकलेगा उसी दिन हमारा संबंध समाप्त हो जाएगा। मेरी कृति पर तुम्हारा विरोध हमारे  संबंध को समाप्त करनेवाला होगा। आपके प्रश्न हमारे प्रेमपाश को तोड देंगे। तब मैं चली जाऊँगी”। सूर्य से निकलने वाली तप्त किरनों के समान मेरे कोमल अधरों से मेरी शर्तें बाहर निकल गयी।

शांति से शांतनु ने कहा, “ बस, इतना ही न?  मान्य !  प्रसन्नता से मैं इन शतों को स्वीकारता हूँ। साक्षात गंगा के समान शुभ्र, सतेज स्त्री कभी अनुचित कार्य नहीं ही करेगी, इसका मुझे विश्वास है।..प्रिये … अब तो तुम मेरे पास आओगी ना?” उसने अपने बलशाली हाथ फैलाए।

और मेरी देह उसके बलशाली शरीर से लग गई। अंग प्रत्यंग में काम-कलियाँ खिलने लगीं.. मानो वर्षा कालीन पाषाण को हरित तृण के अंकुर खिल गए हो। उसने मेरी कोमल ठोड़ी ऊपर उठायी, उसके जामुनि चुंबनोकोत्सुक अधर मेरे कोमलतम जर्द गलाबी अधरद्वय की ओर तेजी से बढ़ने लगे…

मैंने लज्जा से अपनी आँखे बंद कर ली।

अतिव सुख मैं डूबने लगी।

कामशक्ति का महात्म्य मैंने समझा। शाप को भी उसने रमणीय बना दिया था!

……….क्रमशः – भाग 6 ……….

मूल ( मराठी) – डॉ. विनोद गायकवाड

अनुवाद- डॉ. प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

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