प्रो. नव संगीत सिंह
☆ लघुकथा ☆ पहुँच ☆ प्रो. नव संगीत सिंह ☆
श्वेता को एम.ए. करने के तुरंत बाद विश्वविद्यालय में तदर्थ व्याख्याता के रूप में नौकरी मिल गई। उसने न तो नेट पास किया था और न ही एमफिल। उसने पीएचडी शब्द के बारे में भी नहीं सुना था। दरअसल, उसके पिता शिक्षा सचिव के निजी सहायक थे और उन्होंने ही श्वेता को यह नौकरी दिलाने की सिफारिश की थी। श्वेता की अन्य सहेलियाँ पैमी और सुखी उससे ईर्ष्या करती थीं। एक दिन श्वेता ने पैमी से पूछा, “सभी शिक्षकों के नेम-प्लेटों पर उनके नाम के आगे ‘डॉक्टर’ क्यों लिखा हुआ है?” पैमी ने बताया कि “उन सभी के पास डॉक्टरेट की डिग्री है, इसलिए… ” फिर पैमी ने उसे पीएचडी के बारे में विस्तृत जानकारी दी। सुखी भी पास ही बैठी थी। लेकिन वह पैमी को एक तरफ ले गई और बोली, “इसका कुछ नहीं होगा।” तो पैमी ने तुरंत कहा, “देखना, इसका ही कुछ होगा, हम जैसे रह जाएंगे।” शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति के लिए साक्षात्कार शुरू हुए, जिसमें श्वेता विजयी रही और पैमी व सुखी को ‘डॉक्टर’ होने के बावजूद निराशा ही हाथ लगी। पैमी ने सुखी को याद दिलाया, “मैंने तुमसे कहा था ना कि यह बहुत बड़ी चीज़ है!”
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