हेमन्त बावनकर
☆ लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆
☆ दूध रोटी ☆
(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)
काफी दिनों के बाद सेवकराम जी सपत्नीक छोटे भाई और बहू से मिलने गए थे। दोपहर का समय था। सभी लोग लंच ले चुके थे और ड्राइंग रूम में आराम से बैठ कर गपशप कर रहे थे। तभी पीछे के कमरे से माँ अपनी लाठी टेकते-टेकते पहुंची।
डाइनिंग टेबल के पास पहुँच कर बोली – सेवकराम, तुम लोगों ने खाना खा लिया क्या?”
“हाँ माँ।“
“मुझे भूख लगी है, मैंने अभी तक खाना नहीं खाया।”
सेवकराम जी ने सहजता से पूछा – “माँ, क्या खाओगी?”
माँ बोली – “दूध में रोटी भिगो कर दे दो। खा लूँगी।”
सेवकराम जी बहू से बोले – “राधा, माँ को दूध रोटी दे दो।”
राधा बहू किचन में गई और दूध रोटी लाकर डाइनिंग टेबल पर रख कर सोफ़े पर बैठ गई और सभी लोगों ने अपनी गपशप चालू रखी।
थोड़ी देर में माँ दूध रोटी खाकर उठी और बोली – “सेवकराम, मुझे नींद आ रही है, मैं ऊपर जा कर सो जाती हूँ।”
सेवक राम जी बोले – “ठीक है माँ।”
और माँ चुपचाप लकड़ी टेकते-टेकते सामने के दरवाजे से ऊपर के कमरे की ओर चली गई।
अचानक सेवकराम जी को कुछ असहज सा लगा।
उनके मुंह से अनायास ही निकाला – “राधा, माँ ने हम लोगों के साथ खाना क्यों नहीं खाया? अरे! और वे ऊपर के कमरे पर सीढ़ियों से कैसे चली गईं? उन्हें तो सीधी चढ़ना ही नहीं आता?”
तभी छोटा भाई राधेश्याम चौंकते हुए बोला – “भैया, माँ को गए तो नौ महीने के ऊपर हो गए! “
सेवकराम धम्म से सोफ़े पर बैठ गए। उन्हे तो जैसे काटो तो खून नहीं। – “तो, माँ क्या भूखी ही चली गईं थी।“
वे पसीने पसीने हो गए। उन्हे होश भी नहीं रहा कि वे क्या बड़बड़ाते रहे। तभी उनकी पत्नी अनुराधा ने उन्हें नींद से उठाया।
“क्या हो गया? आप इतने परेशान क्यों हैं? कौन सा भयानक सपना देख लिया?”
सेवकराम चुपचाप बिस्तर पर बैठ कर पसीना पोंछते हुए बोले – “कुछ नहीं अनुराधा। एक गिलास पानी दे दो।“
वो दिन है और आज का दिन, दूध में भीगी रोटी कभी उनके गले से ही नहीं उतरी।
© हेमन्त बावनकर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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0 🍀🍀🍀🍀🍀 नमस्कार। माताजी लाठी टेक कर, सीढ़ी चढ़कर, ऊपर के कमरे में चली गई। मनोविज्ञान के अनुसार, स्वप्न में यह दिखना सांकेतिक है। इस बात का द्योतक है कि संभवतः स्वर्ग की ओर चली गई। इसी तरह, दूध-रोटी खाना, एक अतृप्ति की ओर संकेत करता है। और गहरा जाएं, तो शायद यह भी हो सकता है कि मां के जाने के पूर्व, बड़े भैया वहां न गए हों या न जाते हों। उनके मन में अपराध बोध हो कि उन्होंने मां की देखरेख नहीं की। अब उसका विधिवत closure, स्वप्न के माध्यम से हुआ। शायद यही सब भाव लघुकथा… Read more »
बहुत सुंदर कहानी है, आँख भर आयी 😢
बेहतरीन मार्मिक रचना भाई, बधाई हो
बहुत ही दिल को छू ने वाली कहानी है!
इस आत्मीय स्नेह के लिए आप सभी का हृदय से आभार.
उफ़..! क्या कहूँ। रोंगटे खड़े हो गए, अश्रु तैर गए। लघुकथा क्या है, अपरिमित यथार्थ है। 🙏🙏
बहुत मार्मिक लघुकथा। इतना अच्छा लिखने के लिए बधाई।
हृदय स्पर्शी रचना
बहुत बधाई