हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मुझे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

©  हेमन्त बावनकर  

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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SADANAND AMBEKAR
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साहित्य के प्रति उदासीनता का यह यथार्थ चित्र है ।

जगत सिंह बिष्ट
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🙏🙏

Shyam Khaparde
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भाई, साहित्य अब ना जाने कितने ग्रुपों में बट गया है, अच्छे साहित्य की कदर नहीं रही, बहुत बढ़िया रचना, बधाई हो

Dr Bhavna Shukla
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मार्मिक अभिव्यक्ति

Prabha Sonawane
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बात दिलको छू गयी……

Last edited 10 months ago by Prabha Sonawane
नरेंद्र कौर छाबड़ा
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साहित्य के प्रति कम होता रुझान ही ऐसी परिस्थिति पैदा कर रहा है। मर्मस्पर्शी कथा।

Sanjay Bhardwaj
0

लेखक के जीवन की अपरिहार्य शोकांतिका को यह लघुकथा सशक्त ढंग से सामने रखती है।

Hemant Tarey
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बेहतरीन 👌

कुन्दन सिंह परिहार
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जीवन में हर परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए।यह हर लेखक के परिवार की समस्या है। ज़रूरी नहीं कि परिवार के सदस्यों की रुचियां समान हों। साहित्य प्रेमी लोग अभी भी हैं। उन्हें खोज कर पुस्तकें उन्हें सौंपना चाहिए। दुखी होने का कोई कारण नहीं है।

Chhaya saxena
0

यथार्थता यही है कि समय रहते अपनी वस्तुओं को जरूरतमंद को दे दिया जाय अन्यथा वो सब रद्दी के भाव जाता है ।

एकल परिवार के चलन इसके लिए पृष्टभूमि तैयार करता है ।

बहुत अच्छी लघुकथा, चिंतन के लिए ये बिंदु जरूरी है ।

Tirath Singh

0 माइक्रो फैमिली में रूपान्तरित हुए समाज में लोगों के घरों एवं दिलों में अब स्थान बहुत सीमित रह गया है । व्यक्ति के जाने के पश्चात सिर्फ प्रॉपर्टी के कागजात, फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीदें, बीमा पॉलिसी और यदि कोई विल हो तो वह । इसके अलावा जाने वाले का सब कुछ अचानक रद्दी की तरह लगने लगता है। फिर उसके लिए न तो कोई घर में जगह होती है और न ही उसकी कोई कीमत रह जाती है । व्यक्ति के जाने के पश्चात स्वजन भी जल्दी से जल्दी उसके साथ उसकी वस्तुओं से भी छुटकारा पाने का प्रयास… Read more »

Last edited 10 months ago by Tirath Singh
Shantilal Jain
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उम्दा लघुकथा. इसका अंत पाठकों के लिए स्पेस छोड़ता यही इसकी सबसे अहम बात है. आप कितने अंत सोच पाते हैं यह पाठक के मानस में चलता रहता है.

कथा हमारे समय समाज में बढ़ते उपभोक्तावाद से उपजी विसंगतियों को भी उकेरती है, बाज़ारवाद ने किताबों की जगह हमारी जीवनशैली लगभग खत्म ही कर दी है. जितनी किताबें पढीं भी जा रहीं वे परीक्षा के लिए, करियर बनाने को पढ़ी जा रही है.

यह सब कथा में सीधे नहीं आया है मगर ये ध्वनि बैक से लगातार सुनाई पड़ती है. 

उम्दा कथा के लिए कथाकार बावनकर जी को बधाई.

Chhaya saxena
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दादा, आप इसी तरह चिंतन के लिए बिंदु प्रेषित करें जिससे समस्याओं के सकारात्मक हल सामने आ सकें । ऐसी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से हम सभी लाभान्वित होंगे ।

बहुत- बहुत धन्यवाद