श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्तो से बड़ी जमीन।)
☆ लघुकथा # ८३ – रिश्तो से बड़ी जमीन ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
जमीन के बंटवारे की बहस इतनी बढ़ गई की दोनों सगे भाई और दोनों बहनों के बीच में बातचीत भी बंद हो गई। पहले का प्यार जाने कहां खो गया? घर आना जाना भी बंद हो गया।
पहले सब लोग मिलकर के त्यौहार मनाते थे। कितने सुखद दिन थे? जाने क्यों आज बरबस मन बचपन की तरफ मुड़ गया है।
हम सभी गणपति उत्सव में कितने अच्छे से गणेश जी को सजाते थे सुबह-शाम आरती करते थे।
याद है जब पहली बार गणेश जी घर में रखना था, मां पैसे नहीं दे रही थी तो भैया दिन भर कुम्हार के यहां जाकर उसकी मूर्तियां की मिट्टी को घुटने में उसकी मदद की और एक मिट्टी की ही मूर्ति उसे बनवा कर ले आए थे।
और हंसते हुए कहा था- मां तू मुझे गोबर गणेश कहती है। मैं देख अपने हाथों से गणेश जी की मूर्ति बनाना सीख गया हूं और लाकर स्थापित करता हूं। तब से भाई हर बार गणेश जी की मूर्ति स्वयं बनाता था। पता नहीं बड़े भाई रामकिशोर जी इतने क्यों बदल गए? क्या रिश्तो से बड़ी जमीन होती है?
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





