श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – परहित।)
☆ लघुकथा # ८८ – परहित ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
क्या बात है सब बच्चे चले गए पर यह अचानक देवेंद्र क्यों यहां पर आ पड़ा है क्लास के अंदर जाकर दिवाकर जी ने देखा।
आज घर नहीं जाना क्या?
दिवाकर जी ने जोर से देवेंद्र को उठाया।
हां सर मेरी आंख लग गई थी पता नहीं क्यों अच्छा किया आपने उठा दिया अब मैं घर जाता हूं चलो मैं छोड़ देता हूं तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही है तुम मुझसे क्यों नजरे चुरा रहे हो?
कोई बात नहीं है सर।
तुमने मुंह पर कपड़ा क्यों बांधा है और आंखें भी तुम्हारी लाल लग रही है। कोई कारण और बात हो तो मुझे बताओ?
क्या तुमने नशा किया है?
नहीं सर मैं नशा नहीं किया है.
सब मुझे बेचारा नौकर इस तरह से बोलते हैं मैं गरीब झोपड़ी से आता हूं ना इसलिए लग रहा है आप भी मेरा अपमान करना चाह रहे हैं।
दिवाकर ने कहा – देखो तुम बहाने मत बनाओ और नौटंकी मत करो मुझे सब पता है तुम लोगों ने जरूर बियर पिया है।
यह सुनकर देवेंद्र सन्न रह गया कुछ देर गुमसुम रहा।
और बोल कर यह शराब थोड़ी ना होती है। पर शुरुआत तो ऐसे ही होती है तुम बोल रहे हो कि तुम गरीब हो मेहनत करके तुम्हें कुछ बनना है तो क्या तुम इस तरह बनोगे कॉलेज में आकर अय्याशी करके।
चुपचाप मेरे साथ चलो उसे अपने घर लेकर गए और नींबू पानी पिलाया, दिवाकर जी ने और समझाया अपना काम खुद करना चाहिए दूसरों पर हमें निर्भर नहीं रहना चाहिए और दूसरे क्या करते हैं उस बारे में सोचोगे तो कभी जीवन में कुछ नहीं कर पाओगे मैं तो तुम्हें होनहार और अच्छा बच्चा समझता था थोड़ी देर सो जाओ नशा कम हो जाएगा तब घर जाना अपनी मां बहन को तो दुख मत दो।
मेरा तो तुमने दिल तोड़ा ही है कम से कम उनके मन में तो एक गलतफहमी की ख्वाहिश रहने दो कि तुम उन्हें एक अच्छा जीवन दोगे लेकिन तुम्हारा ही भविष्य अब मुझे अंधकार में दिख रहा है।
सर बस बहुत हुआ। आप मुझे बहुत सूना चुके। देवेंद्र ने कहा।
आप ही इतनी होशियार और आदर्शवादी थे तो क्यों नहीं जज, मजिस्ट्रेट, जज कलेक्टर किसी अच्छी पोस्ट पर चले गए रहते। आप तो हो गए शिक्षक ना और ज्ञान मुझे दे रहे हो इतना परहित करना छोड़ दो अपना भला बुरा मैं स्वयं समझ लूंगा।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





