श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देवदूत।)
☆ लघुकथा # ९० – देवदूत ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
झाड़ू लगाने वाली झुमरी जोर-जोर से घंटी बजा रही है।
अंदर से एक आवाज – “आई कौन है, जोर-जोर से घंटी क्यों बजा रहा है और सुबह सुबह मेरी नींद क्यों खराब कर दी, कोई चैन से मुझे सोने नहीं देता?”
राम किशोर ने गेट का ताला खोला।
“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो?”
बाबा काकी से कह दो कि चाय पिला दे ठंड बहुत लग रही है?
रामकिशोर ने कहा – “काकी की तबीयत बहुत खराब हो गई है, उससे शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया है, मैं कृष्णकांत का दोस्त हूं।”
झुमरी ने गहरी सांस लेते हुए कहा – “बाबूजी एक ग्लास पानी तो पिला देना।”
रामकिशोर ने कहा- “बेटा अंदर आकर पानी पी लो और चाय बनाओ तुम भी पियो और मुझे भी पिलाओ।”
“अरे बाबू जी आपने सुबह से कुछ नहीं खाया क्या?आपको तो बहुत जोर से खांसी आ रही है?”
“माजी मुझे रसोई नहीं छूने देती, मैं बाहर झाड़ू लगाती थी और कभी-कभी घर को भी झाड़ू पोछा लगा देती थी।”
रामकिशोर ने कहा- “कोई बात नहीं बेटा अगर तुम्हारे पास समय हो तो चाय हम तुम दोनों पीते हैं और रोटी सब्जी बना दो तो मैं खा लूंगा क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता और यहाँ किसी के टिफिन वाले को ढूंढने जा रहा था इस उम्र में घर का खाना ठीक रहता है पर क्या करूं मुझे कोई खाना देने वाला नहीं है।”
“बाबूजी आप मेरे हाथ का छुआ हुआ खाना खाएंगे क्या?” झुमरी ने धीमे स्वर में कहा।
रामकिशोर जी ने कहा – “हां क्यों तेरे हाथ में क्या खराबी है? बाहर होटल में और टिफिन वाले कौन हैं और उनकी जात क्या पता?”
“ठीक है बेटा तू मेरे लिए भगवान बन कर आई हो।”
“बाबा, क्या आप अपने घर में भी अकेले रहते हो?” झुमरी ने उत्सुकता में पूछा।
हां क्या करूं बेटा, मेरे बेटा बहू बाहर विदेश में रहते हैं और मैं अकेला अपने घर में रहता हूं।”
“बाबा मैं आपके लिए अडूसा के पत्ते लेकर आती हूं। आपकी खांसी,बलगम, ज्वार और घुटनों का दर्द सब ठीक हो जाएगा।”
“भगवान काकी को जल्दी अच्छा कर दे।”
झुमरी और काका दोनों की आंखों से आंसू निकल गए।
“भगवान अच्छे लोगों को इतनी तकलीफ क्यों देता है?” झुमरी कहती कहती रसोई में खाना बनाने लगती है।
राम किशोर मन ही मन सोचते हैं कि भगवान सबको सहारा देता है इस बच्ची के कारण मेरी खांसी भी ठीक हो जाएगी। यह तो सचमुच देवदूत है।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






