श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अदृश्य तमाचा।)
☆ लघुकथा # ९३ – अदृश्य तमाचा ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
अमर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ।
स्वाति तुम मेरे लिए पूरी सब्जी बनाई है नाश्ता क्या बना रही हो?
स्वाति ने कहा – पूरी सब्जी नाश्ते में कर लेना और वही टिफिन में लेते जाना क्योंकि आज मेरे दांत में बहुत दर्द है।
स्वाति तुम्हारे रोज-रोज के नाटक से मैं थक गया हूं।
स्वाति की आंखों से आंसू निकलते रहे और उसने नाश्ते में पोहा बनाया।
पति के ऑफिस जाते ही वह उदास होकर टीवी देखने लग गई, मन में यह सोचने लगी चलो थोड़ा मन बहल जाएगा, तभी अचानक 1:00 बजे के करीब दरवाजे पर आहट होती है, वह दरवाजा खोलती है और बोलती है – अरे! अमर आप इतनी जल्दी घर आ गए।
अमर ने कहा कि – घर आने के लिए भी तुम्हारी इजाज़त लेनी होगी।
स्वाति ने कहा- नहीं क्या हुआ?
अमर मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है।
– गैस बन गई है, इंजेक्शन लगवा लिया, दवा ले लिया है थोड़ी देर आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।
अचानक 4:00 बजे उसकी तबीयत ठीक लगती है और वह कहता है – स्वामी मुझे कुछ खाने को दे दो।
उसने कहा – मैंने अपने लिए खिचड़ी बनाई है आपको दूं क्या?
हां दे दो तुम बहुत अच्छी हो धन्यवाद अब तुम्हारे दांत का दर्द कैसा है चलो मैं डॉक्टर को दिखा देता हूं।
स्वाति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।
और उसने कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए मैं रुक गई।
मैंने अपना बैक पैक कर लिया है अब मैं मम्मी के घर जा रही हूं। अपने घर रहकर फिर आऊंगी। आप अपना ध्यान रखना आपके उठने का इंतजार कर रही थी।
अमर उसे देखता रहता है उसे रोकने की कोशिश करता है पर वह एक बात नहीं सुनती और तुरंत चली जाती है। उसे ऐसा एहसास होता है जैसे उसे कोई अदृश्य तमाचा लगा हो ।
© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’
जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





