श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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