प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
☆ कथा कहानी ☆
☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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“भैया तुम कितनी देर में आओगे?”
“आता हूँ जरा बिजी हूं।”
“भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”
“ट्रिन ट्रिन——“
“——–“
“ट्रिन ट्रिन——–“
“———-“
“अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।
“दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”
“हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।
“नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।
“अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”
“तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”
यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।
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© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे
प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661
(मो.9425484382)
ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






