हेमन्त बावनकर

☆  क्या फर्क पड़ता है? ☆ हेमन्त बावनकर ☆ 

श्श्श्श…श्श्श

शान्त… शान्त

यहाँ सोती हैं

सौ से ज्यादा छोटी छोटी लड़कियाँ

जो पढ़ने के लिए निकली थीं.

पढ़ने तो गईं…

लेकिन, वापिस लौट न सकीं

और

सुला दी गई

उन छोटी छोटी कब्रों में

एक भयावह कब्रगाह में…

इससे,

दुनिया की बाकी छोटी छोटी लड़कियों को

उनके रिश्तेदारों को

और

जो इंसान कहलाने लायक ही नहीं हैं, उनको 

क्या फर्क पड़ता है?

 

वे मासूम लड़कियाँ

तो जानती भी नहीं थी कि…

देश क्या होता है?

सरहद क्या होती है?

मजहब क्या होता है?

नस्ल क्या होती है?

दोस्त देश क्या होता है?

और

दुश्मन देश क्या होता है?

वे तो समझती थी कि

सूरज एक होता है

चाँद एक होता है

और

यह जमीं सभी की होती है.

उनकी सारी दुनिया तो

घर से शुरू होकर

स्कूल तक ख़त्म हो जाती थी.

खा पीकर, पढ़ लिख कर

माँ-बाप की आगोश में खो जाती थी.

फिर,

जिस किसी ने निशाना बनाकर

उनके स्कूल पर मिसाइल दागी थी, उसे

क्या फर्क पड़ता है?

 

हम आदी हो चुके हैं

लड़ाइयों को टी वी पर देखने के

विडियो गेम्स की मानिंद…

तबाही के इस खेल में

अब हमें दिखाई नहीं देते

खँडहर बनते स्कूल और अस्पताल

शहर और इमारतें

शहरों-खंडहरों में दब रही

ऐशो आराम पुरसुकून आलीशान जिंदगी.

तबाह होते

खूबसूरत बाग़ बगीचे. 

अब… बच्चे, मर्द-औरतें और बुजुर्ग

कैसे भी जियें या मरें,

क्या फर्क पड़ता है?

 

हमें सीखने के लिए तो बहुत कुछ था

फिर क्या सीखा हमने ?

हुक्मरानों के तानाशाह होने से…

नागासाकी के परमाणु विस्फोट से…

यातना शिविरों से…

गैस चेम्बरों से…

गैस त्रासदी से…

आतंक के साए से…

धर्मान्धता के जहर से…

कोविड की महामारी से…

लड़ाइयों और नरसंहारों से…

अब, अमन के नाउम्मीद उन्मादियों को

क्या फर्क पड़ता है?

 

मुस्तक़बिल का आलमी अमन इनाम याफ़्ता

शायद कहीं सो रहा है…    

ज्यादातर अवाम बे-रुख़ हो गई है

और हुक्मरान पगला गए हैं…

उन्हें बकौल शायर हबीब जालिब*

याद दिलाना लाजमी है कि-

“तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था”

समझाना नामुमकिन है, उनको

क्या फर्क पड़ता है?

 

उम्मीद की लौ  

बुझी नहीं है…

अथर्ववेद** में ऐसे ही नहीं कहा गया है.

वसुधैव कुटुम्बकम

पूरी दुनिया एक परिवार है

इसलिए

मेरे अल्फाज

सरहदों के बगैर अल्फाज हैं

जो जहाँ कहीं तक पहुंचे

इंसानियत का पैग़ाम लेकर पहुंचे  

अमन का पैग़ाम लेकर पहुंचे

अब ये मत कहना कि- इससे

क्या फर्क पड़ता है?

फर्क तो पड़ता है,

अमन और इंसानियत के पैगाम से…

फर्क तो पड़ता है…

फर्क तो जरुर पड़ता है ! 

* पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब

** अथर्ववेद हिन्दू धर्म के चार वेदों (ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ) में से चौथा वेद है.

©  हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Vivek Ranjan
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गहरी मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना से जुड़ी रचना है। इसमें कवि ने युद्ध, आतंक और हिंसा के कारण मासूम बच्चों, आम लोगों और इंसानियत पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभाव को उजागर किया है।
बधाई

Jaipal
0

युद्ध के विरोध में सशक्त मार्मिक कविता

Shyam Khaparde
0

क्या खूब विष्लेषण किया है भाई, मार्मिक संवेदनाओं से परिपूर्ण एक नसीहत है दुनिया को, आज वैश्विक जग को युद्ध की नहीं बुद्ध की जरूरत है,
उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई हो.

Hemant Tarey
0

बहुत उम्दा. दिल से उपजी सम्वेदना से ओतप्रोत

नरेंद्र कौर छाबड़ा
0

युद्ध के विरोध में बहुत संवेदनशील, मार्मिक ,शानदार रचना हेमंत जी ।दिल को छू गई।

Bhavana Shukla
0

बेहतरीन यथार्थ अभिव्यक्ति