सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’

(ई-अभिव्यक्ति में राजस्थान के साहित्य जगत से सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’ का स्वागत. आप लेखन की विभिन्न विधाओं जैसे कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, नाटक, संस्मरण, दोहे, नवगीत, हाइकु आदि. में विशेष अभिरुचि है. प्रकाशित पुस्तकों में टोह, एहसास के गुँचे एवं खरोंच (काव्य संग्रह) लोकप्रिय हैं। आपकी रचनाओं का हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं जैसे हिंदी चेतना, अनन्य, कविता कोश, सेतु, अमर उजाला काव्य, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर आदि वेबसाइट एवं पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन होता रहता है। डिजिटल साहित्य की दुनिया में आपकी उपलब्धियों में वेबसाईट / ब्लॉग-1.गूँगी गुड़िया,2.अवदत अनीता, ब्लॉग चर्चाकार: चर्चामंच ब्लॉग विशेष रूप से चर्चित हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘खार…’।)

? कविता – खार… ✍️  सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’ ? ?

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मरुस्थल ने

एक ही बात दोहराई

कि

सूरज ने नहीं,

एक महीन सुराख़ ने

समंदर को सोख लिया।

 

वह सुराख़

पुराना घाव बन जाता है,

जो

कभी पूरी तरह भरता नहीं।

 

वह बस त्वचा बदल लेता है।

भीतर

लावा की पतली नसें

धीरे-धीरे चलती रहती हैं।

 

कभी अचानक

कोई स्मृति

अँगुली रख देती है वहाँ

और त्वचा के नीचे

खारे पानी की एक झील

हल्की-सी काँप उठती है।

 

उसे दवा नहीं चाहिए

उसे बस

एक

अदृश्य ठंडा फाहा चाहिए

जो रिसते हुए स्थान पर

अपना माथा रख दे

और कहे-

“तुम बिखरी नहीं हो,

तुम बस बहुत देर तक

आँधी में खड़ी रही।”

 

पर यहाँ

आकाश ताँबे का है,

धरती तपे हुए शंख-सी।

 

हवा-

अपने ही फेफड़ों में

अटकी हुई साँस है।

 

वह

जो कर्तव्य की लौ में

अपने स्पर्श को तपाकर रखता है,

प्रेम को

अनुशासन की अलमारी में

तह कर देता है।

 

उसकी चुप्पी

लोहे का दरवाज़ा नहीं,

एक ऐसा कुआँ है

जिसकी गहराई में

पानी तो बहुत है

पर रस्सी छोटी है।

 

वह

हर दिन

जिम्मेदारियों की थाली में

अपनी साँस परोसता है,

और रात को

आईने में देखता है

आँखों के नीचे

रेत क्यों जमा है?

 

कभी-कभी

वह अपने ही भीतर

एक मरुस्थल पार करता है।

पाँव जलते हैं,

पर कहीं दूर

धुँधला-सा

एक हरा बिंदु दिखता है।

 

उसी क्षण

मौन में

एक महीन दरार पड़ती है

जैसे शंख के भीतर

मोती बनने की पहली किरकिराहट।

 

उसके होंठ नहीं खुलते,

पर भीतर

कोई कहता है-

“सब ठीक होना

घटना नहीं,

धीरे-धीरे उगना है।”

 

और तब

तपती रेत के नीचे

एक अदृश्य बीज

अपने कठोर खोल को

अंदर से धकेलता है।

 

मौन

शोर से नहीं फूटता,

वह तब फूटता है

जब वह

अपने ही घाव पर

हवा बनकर बैठ जाता है।

 

और उसी क्षण

मरुस्थल की लकीरों में

एक नई रेखा जुड़ जाती है

नसीब की नहीं,

निर्णय की।

© सुश्री अनीता सैनी ‘दीप्ति’

जयपुर, राजस्थान ईमेल: anitasaini.poetry@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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