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डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी  की कविता  “स्त्री स्वतन्त्रता  पर आधारित  “नया  दृष्टिकोण” । ऐसे विषय पर नारी ही नारी के हृदय को समझ कर  इतना कुछ कल्पना कर सकती हैं।  आदरणीया डॉ मुक्ता जी की लेखनी को नमन । )

-: दीप अपने अपने :- 

☆ नया दृष्टिकोण ☆

 

मैं हर रोज़

अपने मन से वादा करती हूं

अब औरत के बारे में नहीं लिखूंगी

उसके दु:ख-दर्द को

कागज़ पर नहीं उकेरूंगी

दौपदी,सीता,गांधारी,अहिल्या

और उर्मिला की पीड़ा का

बखान नहीं करूंगी

 

मैं एक अल्हड़, मदमस्त, स्वच्छंद

नारी का आकर्षक चित्र प्रस्तुत करूंगी

जो समझौते और समन्वय से कोसों दूर

लीक से हटकर,पगडंडी पर चल

अपने लिये नयी राह का निर्माण करती

‘खाओ-पीओ, मौज-उड़ाओ’

को जीवन में अपनाती

‘तू नहीं और सही’ का मूल-मंत्र स्वीकार

रंगीन वातावरण में हर क्षण को जीती

वीरानों को महकाती,गुलशन बनाती

पति व उसके परिवारजनों को

अंगुलियों पर नचाती

उन्मुक्त आकाश में विचरण करती

नदी की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती

 

परंतु यह सब त्याज्य है,निंदनीय है

क्योंकि न तो यह रचा-बसा है

हमारे संस्कारों में

और न ही है यह है

हमारी संस्कृति की धरोहर

 

खौल उठता है खून

जब महिलाओं को

शराब के नशे में धुत्त

सड़कों पर उत्पात मचाते

क्लबों में गलबहियां डाले

नृत्य करते

अपहरण व फ़िरौती की

घटनाओं में लिप्त

दहेज के इल्ज़ाम में

निर्दोष पति व परिवारजनों को

जेल की सीखचों के पीछे पहुंचा

फूली नहीं समाती

अपनी तक़दीर पर इतराती

नशे के कारोबार को बढ़ाती

देश के दुश्मनों से हाथ मिलाती

अंधी-गलियों में फंस

स्वयं को भाग्यशाली स्वीकारती

खुशनसीब मानती

क्योंकि व सबला हैं, स्वतंत्र हैं

और हैं नारी शक्ति की प्रतीक…

जो निरंकुश बन

अपनी इच्छा से करतीं

अपना जीवन बसर

 

© डा. मुक्ता

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

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इंदु किरण

सत्यं ,शिवं सुंदरम!!?????

Saroj Dahiya

V.v.good and truth of women life.

सरोज शर्मा

आदरणीया बहुत ही समसामयिक।आज समाज की नवयोवनाएँ इसी दिशा में अग्रसर हैं।संस्कृति की धज्जियाँ उड़ाती।

डॉ रश्मि खुराना

वाह मुक्ता दी, कितनी सच्ची बात कही आपने
नारी को जो ईश्वरीय गुण मिले हैँ उनसे विमुख होकर वह प्रसन्न नहीं रह सकती. जिन्हें आज हम अपनी कमज़ोरी समझ बैठी हैँ वोह वास्तव में हमारी क्षमताएँ हैँ.
बहुत सम सामायिक और उपयोगी लिखा है आपने.