सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!अनगिन भाव!!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ९ ☆
☆ !! अनगिन भाव!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
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पल- पल घटता जाता जीवन, लेता कब है यह ठहराव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।
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सांँसों की आवाजाही में, हो जाती हैं सदियांँ पार।
कितने सपने आंँखों में है, जो ना हो पाते साकार।।
लहरा सकती थी परचम भी, आजादी का रहा अभाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।
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छलनी होता यह मन मेरा, हर दिन देखूं जब अखबार।
जिनको बनना ही था रक्षक, करते वह भी अत्याचार।।
किया समर्पण तो क्या पाया, देते जब अपने ही घाव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।
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घने कोहरे में रख छोड़ी, मासूम कली इक नवजात।
पाला है नारी ने तुझको, नारी को ही देता घात।।
मन मसोस कर रह जाती हूँ, किसे दिखाऊँ अपना ताव।
मैंने भी तो भीतर अपने, छिपा रखे हैं अनगिन भाव।।
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© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”
झालरापाटन राजस्थान
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





