सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
☆ कविता ☆ पहले आम तोड़ने के लिए पत्थर मारते थे – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆
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अब खुद ही गिर जाओ तुम, टूट कर जमीं पर ।
पत्थर मारने वाला बचपन, मोबाइल मे व्यस्त है।।
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अच्छी थी, पगडंडी अपनी।
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।
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फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।
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नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।
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उजड़ गए, सब बाग बगीचे।
दो गमलों में, शान बहुत है।।
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मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।
कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।।
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पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।
कहते हैं, आराम बहुत है।।
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बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।
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आदी हैं, ए.सी. के इतने।
कहते बाहर, गर्मी बहुत है।।
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झुके-झुके, स्कूली बच्चे।
बस्तों में, सामान बहुत है।।
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नही बचे, कोई सम्बन्धी।
अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है।!
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सुविधाओं का, ढेर लगा है।
पर इंसान, परेशान बहुत है परेशान बहुत है।।
🙏🏻
साभार – सोशल मीडिया
कवि – अज्ञात
संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे
संपादिका ई-अभिव्यक्ति (मराठी)
९८२२८४६७६२
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈




