श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे
कविता
☆ मुझे मालूम ही ना था… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆
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तमाशा देखकर मैं तो तमाशा कर नहीं सकता
नशे का हैं वहाँ आलम बना मंदिर नहीं सकता
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दिलो में फ़ासले कितने वहाँ काफ़ी दरारे हैं
अकेला सिर्फ़ में सारी दरारें भर नही सकता
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भरे बाज़ार में मेरी तुने इज्जत उछा ली हैं
छुरा ये जानता है की कटा में सर नही सकता
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ख़ुदा को मानता हूँ मैं मुझे उस पे भरोसा हैं
कहीं भी वार कर पगले यहाँ मैं मर नहीं सकता
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मुझे ओ धर्म बतला ओ जहाँ बिकती नहीं औरत
नई तकदीर लिखने को क़लम अब डर नहीं सकता
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तडप हैं सिर्फ़ पानी की कुआँ भी हैं यहाँ प्यासा
गले के जाम ए साक़ी उतर अंदर नहीं सकता
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मुझे मालूम ही ना था कसम का दायरा क्या हैं
कसम से जान देने को अभी मूकर नहीं सकता
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© अशोक श्रीपाद भांबुरे
धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.
मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈






