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प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

☆ईस्‍टर के शुभ पर्व पर श्री लंका में हुये विस्‍फोट पर ☆

(प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा  रचित  एक सामयिक  एवं भावप्रवण  कविता  “ईस्‍टर के शुभ पर्व पर श्री लंका में हुये विस्‍फोट पर”।)

 

शांति-सुख के शत्रु जिनका काम अत्‍याचार है

औरों को तड़पाते रहने से ही जिनको प्‍यार है

ऐसों का सिर सबको मिलकर कुचल देना चाहिये-

जो कि घृणित विचारों के विस्‍फोट का भण्‍डार है ।।1।।

 

औरों को तड़पा के खुश होते जो हैं संसार में

आदमी वे हैं नहीं शैतान की औलाद हैं।

उन्‍हें अंगारों पे रख कर भूना जाना चाहिये-

उनके दुष्‍कर्मों का यह ही एक सही प्रतिकार है ।।2।।

 

कत्‍ल करके स्‍वर्ग पाने, जिनका दुष्‍ट विचार है

ऐसे ना समझों से बेहद, त्रस्‍त अब संसार है।

ऐसों का जीवन जगत में है भला किस काम का?

दुनियाँ में तो सुख से जीने सभी का अधिकार है ।।3।।

 

काम हों ऐसे जो सबको दे खुशी संसार में

जिन्‍दगी सब जी स‍कें, निश्चित सुख से प्‍यार में।

जो अड़ंगे डालते रहते हैं सबकी राह में-

वे सजाये मौत के कैसे नहीं गुनहगार हैं? ।।4।।

 

जिनकी करतूतों से होते रहते जग में हादसे

निरीहों के खून से जिनके रँगे हैं रास्‍ते-

हो गई बरबाद जिनके काम से कई जिंदगियाँ-

मौत की ही सज़ा माफिक दिखती उनके वास्‍ते ।।5।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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