श्री मनजीत सिंह
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ?” पर चर्चा।
☆ कविता ☆ क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ? ☆ श्री मनजीत सिंह ☆
☆
जानते हो
मेरा जुर्म क्या था…?
मेरी खामोशियों में,
मेरी मुस्कुराहटों में, मेरी तन्हाइयों में,
मेरी जागी हुई रातों में,
मेरी अधूरी बातों में
वह हर बार तुम्हें ढूँढ़ लिया करता था…
मेरी हर दुआ में तुम्हारा नाम था,
मेरी हर खामोश नज़र में तुम्हारी ही तस्वीर बसती थी।
मैं भीड़ में खड़ा होकर भी
तुम्हारी यादों के साथ अकेला हो जाया करता था…
तुम्हारी मोहब्बत ने
मुझे गुनहगार बना दिया था…
गुनाह बस इतना था
कि मैंने तुम्हें दिल से चाहा,
तुम्हें अपनी दुनिया समझ लिया,
और तुम्हारी यादों को
अपनी साँसों में बसा लिया…
पर अब सोचता हूँ
पुरानी बातों को कुरेदने से
क्या हासिल होगा…?
राख को जितना भी कुरेदो,
हाथ बस काले ही होते हैं,
और दब चुकी चिंगारियाँ
फिर से हवा पाकर जलने लगती हैं…
इसलिए अब उन राख बने लम्हों को
वैसे ही पड़ा रहने देना बेहतर है।
जो कभी आग था,
जो कभी धड़कनों की आवाज़ था,
जो कभी मेरी दुनिया हुआ करता था—
वह अब सिर्फ एक कहानी बन चुका है…
एक ऐसी कहानी
जिसे अब दोबारा जीना नहीं,
बस चुपचाप यादों की किताब में
बंद करके रख देना है…
अब उसे सांसों में नहीं,
खामोशी में रहने दो।
अब उसे पुकारना नहीं,
बस दूर से महसूस होने दो…
क्योंकि कुछ रिश्ते
नफ़रत से नहीं टूटते,
वे बस वक्त की थकान से
खामोशी में बदल जाते हैं…
और सच कहूँ
तो कभी-कभी छोड़ देना ही
सबसे सच्ची, सबसे गहरी
और सबसे मुश्किल मोहब्बत होती है…
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© श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







बहुत सुंदर रचना भाई, बधाई हो