डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर
संक्षिप्त परिचय
शिक्षा- एम. ए., एम.फिल., पी-एचडी, बी.एड., डी-लिट. हेतु अध्ययनरत.
- पी-एचडी.का शोध विषय डॉ.शिवप्रसाद सिंह के उपन्यासों में जीवन मूल्यों का चित्रण – एक समीक्षात्मक अध्ययन. (शोध प्रबंध), नीला चांद उपन्यास में जीवन-मूल्य, (लघु शोध प्रबंध.), रामेश्वर शुक्ल अंचल के खंडकाव्य अपराधिता का अध्ययन, (लघु शोध प्रबंध.)
- शैक्षणिक अनुभव 1990 से 97 तक हवाबाग महिला महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक पद पर कार्य.
- चार साल दैनिक समाचार पत्र नवभारत, जबलपुर के संपादकीय विभाग में कार्य., जबलपुर के ऐतिहासिक संदर्भ में 20 से अधिक शोध पत्रों का प्रकाशन.
- वर्तमान में वरिष्ठ व्याख्याता पद पर क्राईस्ट चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जबलपुर में अध्यापनरत.
- दो शोध छात्राओं को पीएचडी हेतु शोध सहयोग
- 5 से अधिक पत्रिकाओं का संपादन.
- मानव संसाधन विभाग नई दिल्ली द्वारा श्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार 2018.
- जबलपुर की शैक्षणिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मान।
- नई पीढ़ी को जबलपुर की साहित्य धारा से परिचित कराने हेतु आईसीएससी एवं सीबीएससी हिंदी परियोजना के अंतर्गत 500 से अधिक क्षेत्रीय साहित्यकारों पर लघु शोध पत्र छात्रों द्वारा तैयार करवाए हैं।
- जबलपुर पुरातत्व पर्यटन एवं संस्कृति परिषद द्वारा आयोजित पर्यटन क्विज़ प्रतियोगिता हेतु क्राईस्ट चर्च स्कूल के छात्रों का मार्गदर्शन। फलस्वरूप छात्रों द्वारा 2016 से लगातार जबलपुर जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
☆ जीवन यात्रा ☆ एक चंदन चरित्र डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ – श्रद्धा स्मरण ☆
डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’
आज जबलपुर की साहित्यिक पत्रकारिता लोकधर्मी प्रतिष्ठा की जिस अधित्यका पर जा पहुंची है, उसकी चढ़ाई का सूत्रपात करने में डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र का यशस्वी योगदान है।
उन्होंने हिंदी के नव लेखकों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य पत्रकारिता के माध्यम से तो किया ही साथ ही काव्य की कुंज गली से बाहर निकल निबंध ,नाटक, उपन्यास ,आलोचना, समालोचना आदि के विभिन्न क्षेत्रों में नव साहित्य साधकों को आगे बढ़ाने का स्तुत्य प्रयास भी किया था।
जबलपुर की हिंदी पत्रकारिता, पाथेय प्रकाशन उनके व्यक्तिगत प्रयत्न एवं प्रोत्साहन की हमेशा ऋणी रहेगी ।
आज देवलोक से, वार्धक्य की विस्मित रेखाओं से जब वह जबलपुर का हिंदी समाज देखते होगें तब उन्हें आत्मिक संतोष अवश्य होता होगा कि उन्होंने सांस्कृतिक पथ प्रदर्शक का कार्य बहुत ईमानदारी से किया।
इक चंदन चरित्र डॉ.राजकुमार तिवारी सुमित्र जी से मेरा परिचय 1990 के पूर्व हुआ जब मैं छायावादोत्तर काल के महाकवि श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के खंडकाव्य अपराधिता पर लघु शोध प्रबंध लिख रहा था और शोध की प्रक्रिया और प्रविधि को ठीक तरह से जानने हेतु मुझे अंचल जी ने सुमित्र जी के पास भेजा।
95,96 से यह परिचय आत्मीयता में बदल गया क्योंकि मैं नवभारत के संपादकीय विभाग में कार्य करने लगा और वहां डॉ.सुमित्र जी का आना अक्सर होता था, वहीं डॉ. तिवारी के हिन्दी की अभिवृद्धि को संजीवित और प्रसृत करने के वाक्य मेरे कर्ण पटल पर आशीर्वाद स्वरुप सुनाई देते थे। कुछ ही दिनों में उनकी पुत्रियों डॉ.भावना जी एवं डॉ.कामना जी बेटे डॉ.हर्ष तिवारी जी के व्यक्तित्व व्यवहार से भी परिचित होता गया।
मुझे स्मरण आ रहा उनका सानिध्य जानकीरमण कॉलेज की एक संगोष्ठी से लौटते समय आदरणीय डॉ.गायत्री तिवारी जी एवं सुमित्र जी ने मुझे सेवा का अवसर दिया और वह मेरी कार में बैठकर कोतवाली तक आए। ममतामयी कथाकार श्रीमती तिवारी का वह आंचलिक वार्तालाप और संवाद आज भी मुझे याद आता है। गायत्री जी की कहानियाँ हर्षित प्रेम की दृष्टि से घरेलु जीवन के मधुरतम क्षणों ,राष्ट्रीय कामना और भावना से उत्प्रेरित थी।
1996-97 में क्राईस्ट-चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हिंदी व्याख्याता नियुक्त होने पर हमारी सीनियर श्रीमती निर्मला तिवारी जी ने राजू भैया के प्रशंसनीय कार्यों को महत्त्व देते पुनः उनके साथ साहित्यिक परिचय कराया ।
मुझे कोतवाली के उस बाडे में बैठाकर कुछ सत्संग-सानिध्य का समय देकर साहित्यिक प्रेरणा के महापात्र बने थे डॉ.तिवारी ! उनके गद्यात्मक काव्य और कविता मय गद्य को सुना था।
मेरे स्कूली छात्रों ने जब जबलपुर के पत्रकारों-साहित्यकारों पर शोध आलेख लिखना शुरू किया तब डॉ. सुमित्र ने मेरे लघु प्रयासों की प्रशंसा और हिन्दी सेवा को महत्व देते हुए जबलपुर के अनेक साहित्यकारों से परिचय कराया, मार्गदर्शन दिया और मेरा मनोबल बढ़ाया ।
आज उनकी जिजीविषा सपृक्त लेखन शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली दो पुस्तकें, शब्द अब नहीं रहे शब्द और आदमी तोता नहीं के काव्यादर्श मेरे आदर्श बन गये हैं, मेरी हृदय से कामना थी कि डॉ. सुमित्र पर साहित्यकार हमेशा लिखते रहें याद करते रहें क्योंकि, लेखन ही उनके जीवन का धर्म-कर्म और अध्यात्म था। वही उन्हें जिंदा रखने वाली, प्राणवायु थी ।
डॉ.सुमित्र कोरे कवि ,पत्रकार मौजी जीव नहीं बल्कि समाज सेवा के व्यावहारिक पहलुओं को संस्थापित, शिक्षित करने वाले ऐसे लेखक थे जिनकी कीर्तिवर्धनी लेखनी समाज को हमेशा उत्प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहेगी।
मैं जानता हूँ कि उनकी भस्मीभूत देह का पुनरागमन कहाँ, उनकी आत्मा अनंत की विपुलता में है आत्मानुभव के आत्म प्रकाश में है।
सादर 🙏
© डॉ. शिव कुमार सिंह ठाकुर
व्याख्याता, हिंदी
क्राईस्ट चर्च बॉयज़ सीनियर सेकेंडरी स्कूल, जबलपुर
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







बेहतरीन सार्थक और सशक्त अभिव्यक्ति
इतना सुंदर यथार्थ चित्रण किया है आपने।
पिताजी का आशीर्वाद सदा आपके साथ है।