श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है श्री मंगतराम शास्त्री ‘खडतल’ जी द्वारा लिखित पुस्तक “खड़तल कहणा ओक्खा सै (काव्य संग्रह)पर चर्चा।

“खड़तल कहणा ओक्खा सै (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री मंगतराम शास्त्री ‘खडतल’ ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक चर्चा

किताब – खड़तल कहणा ओक्खा सै 

कवि- मंगतराम शास्त्री खडतल

समीक्षक- मनजीत सिंह 

प्रकाशन -मनुराज प्रकाशन,जींद

कीमत-320 रुपए भारतीय 

☆ समता के हित की सरोकार कविताएं  – श्री मनजीत सिंह 

मंगतराम शास्त्री जी की किताब” खड़तल कहणा ओक्खा सै”, मिली । खड़तल शब्द अपने आप में एक परगतिशीलता का प्रतिनिधित्व करता है। जिसका मतलब खरी खोटी कहना। सबसे पहले महावीर सिंह दुखी का जिसके परामर्शक से किताब छपी। किसी वस्तु या विषय को देखने की पद्धति में ही कवि की जीवन-दृष्टि और काव्य-दृष्टि छुपी रहती है। प्रगतिशील काव्यधारा इस दिशा में ग्रामीण परिदृश्य और जिला जींद एवं तहसील के नितान्त करीब की बोली दिखती है। अपनी बोली में लिखना और प्रगतिशील धाराप्रवाह के कवि ऐसे प्रतीकों से चित्र गढ़ते हैं कि प्रसंग प्राणवाण हो उठता है। गाँव-देहात का अकृत्रिम जीवन, जीर्ण स्वास्थ्य, ठेठ दृश्यावली हर कोई देखता है, पर कुछ पंक्तियां –

आपणा खोट छुपाणा सीख,औरां कै सिर लाणा सीख ।

सारे यार करैंगे प्यार, चिकणी चुपड़ी लाणा सीख ‌।

कवि‍ को ये लोग अभाव, भूख, कुपोषण, शोषण के भुक्तभोगी दिखते हैं। बिम्ब में व्यंग्य का दंश तीक्ष्णतर करने में उन्हें सिद्धि प्राप्‍त है। किसी वस्तु या विषय को देखने की पद्धति में ही कवि की जीवन-दृष्टि और काव्य-दृष्टि छुपी रहती है। जो शास्त्री जी की कविताओं में झलकता है ‌।

हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्‍च चिन्तन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो… जो हमें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।” यही नहीं, प्रेमचन्द को पूर्व में ही आभास हो गया था कि ‘आने वाला जमाना अब किसान और मजदूरों का है।

किसान मजदूर को समर्पित पंक्तियां-

जिंदगी भर छान म्हं ढकते रहे सिर, उन कमेर्यां नै तेरे बंगले चिणे सैं।

बोझ नीच्चे बीत गी जिनकी जवान्नी,वें बडेरे नींव के पत्थर बणे सैं ‌‌।

नागरिक जीवन के दुख-दुविधा, सुख-सुविधा की समझ, जमाखोरी का विरोध, स्थापित समाज व्यवस्था की रूढ़ियों और जड़ मनस्थितियों का खण्डन, राष्ट्र एवं विश्‍व के प्रति सजग दृष्टि; नीति मूल्य, जीवन-मूल्य, मानव-मूल्य, सम्बन्ध मूल्य की मौलिकता की समझ; जीवन की सहजता बाधित करने वाली जर्जर मान्यताओं, पद्धतियों का तिरस्कार, प्रगति और परिवर्तन के प्रति चेतना, समाज को मानवीय और नैतिक बने रहने, अधिकार-रक्षण हेतु संघर्षोन्मुख रहने की प्रेरणा, स्पष्ट सम्प्रेषण के प्रति सावधानी… प्रगतिशील काव्यधारा के ये कुछ मूल स्वभाव इनकी रचनाओं में आसानी से दिखते हैं। यहाँ नए के प्रति बेवजह आग्रह नहीं है, पुराने के प्रति बेवजह घृणा नहीं है। पूरी तरह संयमित विवेक के साथ प्रगतिवाद का प्रवेश और आह्वान हुआ जैसे –

लाट्ठी देक्खी गोली देक्खी, बिफता औली सौली देक्खी ‌।

यह कविता सरसरी तौर पर सपाट लग सकती है, पर कवि की बड़ी जिम्मेदारी होती है। राष्ट्रीय संकट की घड़ी में ओछी लिप्सा त्यागकर प्रगतिशील कवियों ने अपना दायित्व जिस निष्ठा और समझ-बूझ के साथ निबाहा, वह इस कवि ने हरियाणवी कविता, ग़ज़ल, नज़्म,सांग नाटक आदि में देखने को मिलता है।, हरियाणवी साहित्य और हरियाणा की राज्य स्तरीय अस्मिता के लिए अप्रतिम उदाहरण है। शायद यही कारण है कि आज की समकालीन कविता में भी इनकी चेतना और समझ बूझ की पद्धति जीवित है। शास्त्री जी की एक ओर पर्यावरण संरक्षण पर कविता

खाद-पाणी के बिना ज्यू रूख नी फलदा। न्यू ए बात्ती-तेल बिन दीवा नहीं बल्दा ।।

आग नफरत की जलावै सै घरां नै तो सिर्फ तात्ते पाणियां तै घर नहीं जलदा।

क्यूं कबुत्तर की तरां तू आंख भीच्चै सै आंख मीच्चण तै कदे खतरा नहीं टलदा।

आदमी म्हं जहर इतना हो लिया इब तो आसतीन्नां म्हं भी डरदा सांप नी पलदा।

सांझ – तड़का सै जमीं की चाल का नीयम बादलों के छाण भर तै दिन नहीं ढल्दा।

खड़तल कहणा ओक्खा सै को किताब का रूप देने वाली प्रकाशन मनुराज का शुक्रिया और जिन्होंने इस किताब में किंचित मात्र भी सींच करी किसी भी रूप में उन सबका भी धन्यवाद करता हूं।

जै बडेरी नै संभालणियें घरां होन्दे तो खटोल्ली म्हं पड़ी का गात नी गलदा।

बख्त पै माणस रलै सै आसरा बण कै आंट म्हं ‘खड़तल’ कै कोये और नी रल्दा।

यह आज के युवा के लिए एक बेहतर किताब है सभी ने एक बार इस किताब को पढ़ना चाहिए। बदलते दौर की कठिनाइयां को कविताओं में ढालने का काम किया है ‌।

चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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