श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ पतवार तुम्हें दे जाऊंगा – श्री विजय नेमा ‘अनुज’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. राजकुमार जी सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि – “मन कभी चंदन सा महकता है और कभी ज्वालामुखी सा दहकता है. कवि मन जानता और पहचानता है अपनी भाव संपदा, अपनी ऋतुएँ और रंग. कवि होने के आवश्यक है संवेदना”. सुमित्र जी की इसी भाव अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान की है वर्तिका संस्था के संयोजक आत्म प्रिय भाई श्री विजय नेमा अनुज ने अपने काव्य संग्रह पतवार तुम्हें दे जाऊंगा, में.

श्री विजय नेमा ‘अनुज’

इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य पं. कृष्णकांत चतुर्वेदी , आचार्य श्री संजीव वर्मा सलिल, श्री हरेराम समीप, डा. राजकुमार सुमित्र, आचार्य डा. हरिशंकर दुबे, आचार्य  पं. भगवत दुबे, श्री विजय बागरी विजय और श्री राजेश पाठक प्रवीण की शुभकामनाओं के रुप में इतनी सशक्त और सारगर्भित प्रतिक्रियाएं  हैं कि पाठक वर्ग पुस्तक की कविताओं के प्रति  बरबस आकर्षित और प्रभावित होकर सभी कविताएँ उत्साह और उत्सुकता से  पढ़ डालता है और इन्हीं में से एक पाठक मैं भी हूँ जिसने इस संग्रह की कविताओं को न केवल उत्सुकता से पढ़ा बल्कि उस पर चिंतन  भी किया.

इस संग्रह की कविताएँ जब  हम पढ़ते हैं तो लगता है कि ये कविताएँ राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में लिखी हुईं  ऐसी कविताएँ हैं  जो  व्यक्ति को कुछ सार्थक रुप से सोचने, कुछ करने और आगे बढ़ने के लिए  मार्गदर्शन करती हैं और प्रेरणा देती हैं. कवि ने काव्य रचना के समय मानवीय  संवेदनाओं को पूरी तरह ध्यान में रखा है और अपने आत्म निवेदन में इसे स्वीकार भी किया है. अनुज जी लिखते हैं कि साहित्य सृजन तभी संभव और  सार्थक माना जाता है, जब साहित्यकार अपनी संवेदना और अपनी अनुभूति को पूरी कलात्मकता के साथ सुन्दर शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करता है.

कवि का मानना है कि कविताओं में समाज के लिए विरासत में  दी गई प्रेरणा का होना आवश्यक है और उन्होंने अपनी कविता में भी यही बात कही है

बस रैन बसेरा कर लूँ मैं

  फिर भोर हुए उठ जाऊँगा

     ले जाना नाव किनारे तुम

      पतवार तुम्हें दे जाऊंगा

कविवर  ने समाज में बेटियों के मंगलमय भविष्य की कामना करते हुए   उन्हें ससुराल में सुखद और सुन्दर जीवन के निर्वाह हेतु कल्याणकारी संदेश भी दिया है

दिल जीतना परिवार का

सेवा मुदित करना वहाँ

पति धर्म पालन कर

सुखद लज्जावती बनना वहाँ

82 कविताओं का यह संग्रह श्री विजय नेमा अनुज ने अपने पिता तुल्य बड़े भैया श्री पुरुषोत्तम दास जी नेमा और बड़ी भाभी जी श्रीमती केशर नेमा जी को सादर समर्पित किया है.

सारगर्भित, सुन्दर और प्रेरणा दायक इन कविताओं का यह संग्रह पाठकों के बीच पठनीय और प्रशंसनीय सिध्द होगा, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है.

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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