श्री यशोवर्धन पाठक

 

☆ पुस्तक चर्चा ☆ जयप्रकाश पांडेय का व्यंग्य संग्रह – रुप बदलते सांप ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

आज जब मैं श्री जयप्रकाश पांडेय के व्यंग्य संग्रह रुप बदलते सांप का अध्ययन और मनन करने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मेरा ध्यान सबसे पहले तो इस कृति की भूमिका पर जा रहा है जिसमें सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा . रमेश तिवारी ने ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया शीर्षक से अपनी भूमिका में  कुछ  ऐसी सारगर्भित और निष्पक्ष बात कही है जिससे पाठक वर्ग की उत्सुकता इस संग्रह की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ने के प्रति बढ़ जाती है। श्री रमेश तिवारी लिखते हैं कि जहां तक इनकी व्यंग्य रचनाओं की बात करें तो इनके लेखन में एक अलग ही मिजाज दिखाई देता है जो इन्हें एक अलग रचनात्मक पहचान देता है।इस संग्रह की रचनाओं में भी हम इनके इस मिजाज को भली भांति देख सकते हैं। चाहे वह तकदीर में तूफान व्यंग्य रचना हो या बैठे ठाले, मूर्ति की महिमा, तीन मौसम के दंगल , थोड़े में थोड़ी सी बातचेक का चक्कर आदि रचनाएं।

प्रायः सभी रचनाओं को पढ़ते हुए यह बात बहुत अच्छी तरह समझ में आती है कि इनके व्यंग्य के स्वर बहुत लाउड या तल्ख नहीं हैं। हालांकि इस सन्दर्भ में हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि लेखक का परिवेश लेखन को प्रभावित करता है।अगर डा . रमेश तिवारी जी की भूमिका की कुछ और बातों पर ध्यान दें तो इस कृति की व्यंग्य रचनाओं में वाकपटुता का कमाल, लेखकीय अभिव्यंजना औशल का बेहतरीन उदाहरण भी देखने को मिलता है हम अगर एक अन्य व्यंग्य रचना सेल की शाल के आरंभिक वाक् य को देखें तो उसमें व्याप्त व्यंग्य हमें आज के व्यापारिक छल छध्म को अनावृत करता दिखाई देता है। करेला और नीम चढ़ा की तरह सेल में डिस्काउंट चढ़ बैठता है और पुरुष सेल और डिस्काउंट से चिढ़ते हैं और महिलाएं सेल और डिस्काउंट के चक्कर में दुकान की सीढ़ी चढ़ती हैं ।

देखा जाए तो एक  व्यंग्यकार  अपने आसपास जो देखता है और महसूस करता है वह  कलम के माध्यम से कागज पर  उतार देता है और चूंकि व्यंग्यकार की नजर अत्यंत पैनी होती है  इसलिए उसके तीखे कटाक्ष के साथ उसका पाठकों को वह पठनीय भी लगता है ।पांडेय जी एक बैंक अधिकारी रहे हैं इसलिए कार्यालयीन अव्यवस्थाओं को  उन्होंने काफी नजदीक से देखा समझा है  इसलिए उन्होंने सफलता पूर्वक इस कड़वे सच को अपने व्यंग्य रचनाओं में व्यक्त भी किया है । रुप बदलते सांप नामक इस कृति में उन्होंने बैंक में सांप के घुसने से लेकर उसके पकड़ने और हेड आफिस के हस्तक्षेप को काफी तीखे अंदाज में व्यक्त किया है जो कि आज की अव्यवस्थाओं को उजागर करता है ।इस व्यंग्य संग्रह की रचनाओं से  हमें श्री जय प्रकाश पांडेय की गहरी और व्यापक सोच का पता भी चलता है। पांडेय जी की इस पुस्तक में राजनीतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों के प्रति उनके व्यापक नजरिए का पता चलता है और इसलिए पाठक वर्ग को इन सभी रचनाओं से गहरे  अपनापन का अहसास होता है ।इस कृति में कुछ ऐसी रचनाएं हैं जो कि अपनी रोचकता के कारण पाठकों को बेहद प्रभावित करती हैं जैसे – चौक का चक्कर, नींबू मिर्ची के‌ टोटके, कोहरे में किल्लत,बंगला बने न्यारा , बारिश तुम कब आओगी, बाप रे बाप , गांधी का भूगोल, मोहल्ले में मंदिर, दिल्ली और दिलेरी, ए टी एम में खुचड इत्यादि रचनाओं में पाठकों को अपनी  अपनी पसंद की  ऐसे व्यंग्य पढ़ने को मिल सकते हैं जो कि उन्हें कुछ सोचने समझने का अवसर दे सकते उपरोक्त बातों के संबंध में जयप्रकाश जी पांडेय का यह कथन भी यहां उल्लेखनीय है कि इस संग्रह में जो व्यंग्य लेख लिए गए हैं उनके विषय सर्वथा अलग अलग तरह के हैं । कहीं सामाजिक जीवन की विसंगतियों पर, कहीं आडंबर और कुरीतियों पर ,तो कहीं रंग बदलती राजनीति के अलावा मानवीय मूल्यों क्षरण पर ध्यान आकर्षित किया गया है।हैं।श्री जयप्रकाश पांडेय ने अपने नाम को पूरी तरह सार्थक किया था। साहित्य जगत में उन्होंने  प्रकाश पुंज के रूप में अपनी पहचान बनाई और अपने उल्लेखनीय योगदान से जय के अधिकारी बने । जय प्रकाश जी की का व्यंग्य रचनाओं का एक बड़ा पाठक वर्ग था जो उनकी रचनाओं को उत्सुकता से पढ़ता था और पसंद भी करता था।

जय प्रकाश जी के व्यंग्य लेखन का अनूठा अंदाज था और मेरी ये पंक्तियां उस अंदाज को  थोड़े में व्यक्त करने के लिए गागर में सागर का उदाहरण बन सकती हैं-

व्यंग्य विधा के पैरोकार थे,

व्यंग्य तुम्हारे धारदार थे,

पैनापन तीखे प्रहार थे,

कलमकार तुम शानदार थे ।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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