? पुस्तक चर्चा –  अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ? समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ?

उपन्यास का नाम: अचानक डूबता सूरज उग आया

उपन्यासकार: राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी

प्रकाशक: कोहबर प्रकाशन लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

प्रकाशन वर्ष: 2025

कुल पृष्ठ: 152

मूल्य: ₹299

☆ “अचानक डूबता डूबता सूरज उग आया” :  मानव कर्तव्य की सफलता है ☆ डॉ जयप्रकाश तिवारी

इस उपन्यास में चिंतन के अनेक, विविध उत्कृष्ट रोचक और संवेदनशील आयाम हैं जो हमे मानव होने, मानव कर्त्तव्य का बोध करते हैं।

1 – इसका उपन्यास का नायक लखनऊ निवासी राजीव रस्तोगी है जो धनाढ्य परिवार से होते हुए भी सादगी और सनातन का जीता जागता प्रतिमूर्ति है। विश्वबन्धुत्व का व्यवहार उसके चरित्र से झलक रहा है। उसकी मित्र मंडली में सहृदय युवक/युवतियों की भरमार है। वहां जाति भेद, वर्गभेद, संप्रदाय भेद नहीं है। उसके मित्र मंडली में जहां अनेक हिन्दू युवक है, वही मुस्लिम सोहेल, एजाज, वाहिबा है तो अफ्रीकी मूल की ग्रेसी भी और एंग्लो इंडियन नायिका रूबी भी है, जिससे उसका विवाह संपन्न होता है। सभी मानवता और प्रगति के पुजारी हैं। उसमें धीरता के साथ साथ एक और गुण भी है, उसे गुण नदी; सद्गुण कहना चाहिए – गुह्यं च निगूहति गुणानि प्रकटी करोति की। यह संस्कृत और हमारी संस्कृति की देन है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

2 – इस उपन्यास के नायक का दिल यदि अपने संस्कार और प्रेम के लिए धड़कता है तो मस्तिष्कत कर कर्म दायित्व और नशा पीड़ित समाज के उन्मूलन के लिए।

3 इस उपन्यास में दिल और मस्तिष्क में अद्भुत समन्वय है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में राजीव का यह संतुलन हमे बहुत कुछ सिखाता है।

4 – यदि पाठक या समीक्षक से प्रश्न किया जाय कि राजेश हृदय की ओर उन्मुख है या मस्तिष्क, कर्तव्य की ओर? तो पाठक और समीक्षक उसे किसी एक वर्ग में नहीं रख पाएगा। उसे दोनों ही संवर्गों का श्रेष्ठ उदाहरण घोषित करना पड़ेगा। यह किसी के भी व्यक्तित्व का धनात्मक और चमत्कारी प्रभाव छोड़ने वाला चरित्र है।

5 –  ऐसा संतुलन वह अपने जीवन में कैसे रख पाया? या स्वयं को साध पाया तो इसका एकमात्र उत्तर है उसका सनातनी शिक्षा, मर्यादा और सिद्धांतों में अटूट विश्वास। वह लंदन में रिश्तेदार यहां उपेक्षित होने बावजूद अपने मां बाप को नहीं बताता कि पिता और मित्र में दरार आ जाएगी। वह पूछने पर प्रशंसा ही करता है। इस प्रकार इस उपन्यास ने सनातन संस्कृति और लखनऊ की तहजीब दोनों को निखारा है। यह जन्मभूमि और कर्मभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यही समर्पण मन में – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का भाव जागृत करती है।

6 – संचरित बीमारियों की व्यापकता, उनके समाज और उनकी विभीषिका, टूटते परिवार का वर्णन तो है ही; टूटते परिवारों को कैसे जोड़ा जाय? यह उपाय भी है। नृपेंद्र और आरती के टूटते दाम्पत्य का जुड़ना, उनके दाम्पत्य जीवन के तिमिर से दाम्पत्य की किरण फूटना ही “अचानक डूबता सूरज उग आया” शीर्षक रूप में प्रकट हुआ है। इसका बिंब चित्र देखिए – “आरती और नृपेंद्र की नजरें एक दूसरे से मिली तो वे देर तक अपने को रोक नहीं सके। … दोनों ने अतीत की बीती हुई बात को एक दुःस्वप्न मानकर उसे हमेशा – हमेशा के लिए भुला देने का संकल्प लिया। उन्हें एक दूसरे से कुछ कहने के लिए अब शेष नहीं था क्योंकि आरती ने राजीव के पीछे के कमरे में बैठकर राजीव और नृपेंद्र के बीच हुई पूरी बात को सुन लिया था। अब सारा का सारा माहौल बदल चुका था। क्योंकि अब डूबता सूरज उग आया था”।

कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जागृति उपन्यास है जो एक ओर मानवीय संबंधों को जागृत करता है और दूसरी ओर नशा उन्मूलन की गूढ़ व्याख्या कर जन जागृति करता है। मानवीय दृष्टि और जनजागरण तथा नशा उन्मूलन की दृष्टि से यह अनुपम उपन्यास है। बीमारियों को केंद्र में रखकर प्रेम, सौहार्द्र और समर्पण का ऐसा तना बना बना गया है कि पाठक का मन कभी भी उबाऊपन, थकान, नीरसता का अनुभव नहीं करता; अपितु अपने को बुराइयों के निर्मूलन का एक अंग मन लेता है। इस यात्रा में सहयात्री बन जाता है। यही उपन्यासकार की सफलता है। यह यात्रा कैसे प्रारम्भ होती है? कैसे अपने लक्ष्य का संधान कर उसे पूर्णता तक पहुंचाती है, इसे पाठक स्वयं उपन्यास क्रय करके पढ़े तो उसे अधिक आनंद आएगा। हां, इतना अवश्य आश्वस्त करना चाहूंगा कि उपन्यास क्रय करने का उसे अफसोस या निराशा नहीं होगा, उसे धन व्यय की सार्थकता की अनुभूति होगी।

एक उपन्यासकार, कवि, समीक्षक और संगठनकर्ता के रूप में श्री राजेश सिंह श्रेयस का व्यक्तित्व अत्यंत ऊर्जस्वी है। उनके लेखन को नमन और साधुवाद। उनकी लेखनी अविरल, आबाद चलती रहे, उनको बहुत – बहुत बधाई और साधुवाद।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© डॉ जयप्रकाश तिवारी

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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