श्री यशोवर्धन पाठक
☆ पुस्तक चर्चा ☆
☆ श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
श्री राज सागरी
(जन्म दिवस 1अप्रैल पर मंगल भाव सहित)
आज जब मैं बुंदेली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे सबसे पहले तो इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रोफेसर श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि की ये प्रतिक्रिया काफी प्रभावित कर रही है कि श्री राज सागरी ने खड़ी बोली, बुंदेली और उर्दू में साधिकार रचनाएं लिखी हैं। अपने चालीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में पूरे प्रदेश और देश में हजारों पाठकों के मन में किसी न किसी रूप में अपनी रचनाओं को प्रतिष्ठित किया है और मंचों से काव्य पाठ करके हजारों हजार श्रोताओं को मंत्र मुग्ध किया है। बार बार श्रोता उनकी रचनाओं को सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। साहित्य के त्रिवेणी संगम -प्रयाग राज सागरी के शीर्षक से श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि लिखते हैं कि वर्तमान में चुटकुले बाज तथाकथित कवियों के बीच राज सागरी जब काव्य पाठ करते हैं तो केवल वही मंच लूटते नज़र आते हैं। उनकी कविताएं न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि प्रेरणा भी देती हैं, ऊर्जा प्रदान करती हैं,नयी दिशा देती हैं। ऋषि के उपरोक्त नजरिए से ये बात तो स्पष्ट होती है की राज सागरी जी ने बुंदेली भाषा में काव्य सृजन करते हुए संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। उन्होंने दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से बुंदेली को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में जो योगदान दिया है,वह अन्य साहित्यकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय हो सकता है। राज सागरी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार में उनकी जो भी रचनाएं शामिल हैं वे समाज के विभिन्न पाठकों की रुचियों को ध्यान में रखकर सृजित की गई है। पाठकों को ये रचनाएं इसलिए भी पठनीय प्रतीत होती है क्योंकि बुंदेली भाषा में उन्हें ये रचनाएं अपने आसपास की घटनाओं और प्रसंगों पर आधारित महसूस होती हैं और फिर कवि ने भी अपने आसपास जो भी सामाजिक समस्याओं और स्थितियों को देखा परखा उसे पूरी ईमानदारी के साथ कलम के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया।
राज सागरी जी की ग़ज़लों और दोहों की एक विशेषता और है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए बड़ी बेबाकी से लिखा है और पाठकों ने इसे बेहद पसंद भी किया है। कवि ने अपने काव्य सृजन को अपना श्रेष्ठ धर्म और कर्म माना है और यही संदेश उनकी रचना में भी दिखता है –
0
गीत ग़ज़ल तुम गातई चलयो
जाग में नाम कमातई चलयो
0
कवि ने विद्वता के लिए आंखों की भाषा की समझ और सोच को भी अपनी रचना में प्रमुखता दी है और एक जगह लिखा भी है –
0
मोरी बातई छोड़ दो, मैं तौ हूं नादान
आंखें तुम जो बांच लो, तौ समजूं विद्वान
0
राज सागरी जी राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को आवश्यक मानते हैं और यही बात उनकी कविता में भी झलकती है। भारत माता कविता में उन्होंने लिखा भी है कि –
0
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम चारों हैं भाई
हिन्दुस्तानी प्यार सिखाते
लड़ते नहीं लड़ाई
0
राज सागरी जी का वैचारिक दृष्टिकोण उनकी बुंदेली कविता में भी परिलक्षित होता है। उनका सोचना है कि ग़लत काम करने वाले लोग निडरता से अपना काम करते हैं-
0
खा जैहें का जोन डरें हम
काय खों उनके पांव परें हम
प्यार सें बे हैरत लौ नयींया
उनपे बोलो काय मरें हम
ऐसीं बुद्धि दे अब ईसुर
कोई गलत नें काम करें हम
0
वैसे तो श्री राज सागरी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में काफी लिखा है लेकिन उन्हें बुंदेली भाषा में सृजन के लिए अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता अर्जित हुई है। खड़ी बोली में उनका काव्य संग्रह पल भर की पारो और तारे जमीन के भी चर्चित रहा। बाल साहित्य के अंतर्गत स्कूल चलें हम, उर्दू में कदम कदम और बुंदेली में ग़ज़ल संग्रह चलो अब घर खों चलिए और जाम- ए-गजल का प्रकाशन हो चुका है जो कि पाठकों के बीच अत्यंत पठनीय सिद्ध हुए हैं।
अमन प्रकाशन सागर से प्रकाशित नदिया के ओ पार में श्री राज सागरी जी की काव्य रचनाओं को पाठकों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा कि पूर्व में प्रकाशित काव्य कृतियों को मिला है और सागरी जी ने भी इसीलिए कृति के प्रारंभ में ही पाठकों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की है –
0
सारे जहां में आपने चमका दिया मुझे
मैं मुख्त़सर था आपने फैला दिया मुझे
0
मंगल भाव सहित
—–
© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर
संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





