श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – स्मृतियाँ
“मेरा दावा है कि स्मृतियाँ केवल मेरी धरोहर हैं”, उसने कहा।
“मैं सहमत हूँ”, उसने माना।
“कितनी आसानी से मान लिया! कभी मेरी कोई स्मृति आकर तुम्हें बेचैन नहीं करती? भीतर जमी बर्फ़ को पिघलाती नहीं? ठहरे पानी में हलचल नहीं मचाती?” इस बार उसके स्वर में आक्रोश था।
“अतीत की कोख से स्मृतियाँ जन्म लेती हैं। जिसने जीवन उसी समय के साथ जिया हो, उसी समय में जिया हो, अतीत को जड़ जमाने ही न दी हो, स्मृतियाँ भला उसकी धरोहर कैसे हो सकती हैं?”..एक उसाँस के साथ उसने उत्तर दिया।
अब दूसरी ओर से भी उसाँस भरी जा रही थी।
© संजय भारद्वाज
अपराह्न 13:57 बजे, 24 जुलाई 2025
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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