श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – ब्रह्मांड
-इस दुनिया के अलावा मेरे भीतर एक और दुनिया बसती है, समुद्री जीव-जंतुओं की दुनिया। खारे पानी के भीतर की दुनिया मुझे बेहद आकर्षित करती है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, व्हेल, शार्क, डॉलफिन, ऑक्टोपस, शैवाल, कवक, कोरल और जाने क्या-क्या…, पहले ने कहा।
-मेरे भीतर की दुनिया में अंतरिक्ष है, आकाशगंगा हैं। उल्का पिंड हैं, धूमकेतु हैं। इस दुनिया में सौरमंडल है। सूर्य है, बृहस्पति है, शनि है, शुक्र है, मंगल है, बुध है, यूरेनस है, नेपच्यून है, और भी घूमते अनेक ग्रह हैं, ग्रहों पर बस्तियाँ हैं, बस्तियों में रहते एलियंस हैं…, दूसरे ने कहा।
-मेरे भीतर तो अपनी धरती के जंगल हैं जो लगातार मुझे बुलाते हैं। घने जंगल, तरह-तरह के जंगली जानवर, जानवरों का आपसी तालमेल! सोचता हूँ कि इस जंगल के इतने भीतर चला जाऊँ कि किसी दिन डायनासोर को वहाँ टहलता हुआ देख सकूँ…, तीसरे ने कहा।
-मेरे भीतर की दुनिया कहती है कि मैं पर्वतों पर चढ़ने के लिए पैदा हुआ हूँ। चोटियाँ मुझे आवाज़ लगाती हैं। हर ग्लेशियर में जैसे मेरी आत्मा का एक टुकड़ा जमा हुआ हो। पैर उठते हैं और चोटियाँ नापने लगते हैं।
-मेरे भीतर की दुनिया में है भूगर्भ…मेरी दुनिया में पेड़-पत्ते हैं….मेरी दुनिया तो पंछी हैं…मैं चींटियों की सारी प्रजातियों और उनकी जीवनशैली के बारे में जानना चाहता हूँ…।
अनगिनत लोग, हरेक के भीतर अपनी एक दुनिया..!
-एक बात बताओ, यह आदमी जो हमेशा खोया-खोया-सा रहता है, इसके भीतर भला कौनसी दुनिया बसती होगी?
-उसके भीतर दुनिया नहीं, पूरा ब्रह्मांड है। इसकी दुनिया, उसकी दुनिया, हमारी दुनिया, तुम्हारी दुनिया, हरेक की दुनिया उसके भीतर है। आँखों से दिखती दुनिया के साथ आदमी के अंतर्मन की दुनिया उसके भीतर है। आदमी को देखने, जानने, खंगालने की दुनिया है। उसकी अपनी दुनिया है, उसका अपना सौरमंडल है। वह अपनी दुनिया बनाता है, अपनी दुनिया चलाता है, वही अपनी दुनिया में प्रलय भी लाता है। उसके भीतर सृजन है, उसीके भीतर विसर्जन है।…वह कर्ता है, लेखनी से नित अपनी सृष्टि रचता है। वह लेखक है।
© संजय भारद्वाज
सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या 7:15 बजे
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





