श्री घनश्याम अग्रवाल
☆ लघुकथा – “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆
(महान अभिनेता बलराज साहनी के स्मरण दिवस पर प्रणाम स्वरुप यह लघुकथा)
बलराज साहनी यह लोक छोड़कर देवलोक चले गये। वहाँ नारदमुनी इन्द्र को बता रहे थे कि आज पृथ्वी लोक से एक बहुत बड़ा अभिनेता आया है। आप उसे अपने अभिनय विभाग में अभिनय का देवता बना ले ।”
” हे नारद, हमारे यहाँ तो बड़े-बडे कलाकार रोज ही आते रहते हैं। हमारे विभाग में एक से बढ़कर एक अभिनय सम्भ्राट हैं। यूँ हर किसी को अभिनय का देवता बनाते रहे तो हो लिया…, फिर भी तुम्हारी बात पर कल हम उसकी परीक्षा लेगे।” कहकर इन्द्र ने अपने अभिनय विभाग के सभी देवताओं को बुलाया और उन्हें बलराज साहनी के सभी फिल्मों की सीडी देते हुए कहा-” तुम इनमें से अपना-अपना किरदार चुन लो। तुम्हें इससे बढ़कर अभिनय करना है। निर्णायक के लिए बी आर चोपड़ा और बिमल राय को बुलाया है। देखो, ये देवताओं की इज्जत का सवाल है। तुम्हें बलराज साहनी के किरदारों को उससे बढ़कर करके दिखाना है। अब जाओ, और तैयारी में लग जाओ। ” सारे देवता सीडी लेकर चले गए।
दूसरे दिन परीक्षा शुरू हुई। देवताओं ने उनके किरदारों का इतना हूबहू अभिनय किया कि बिमल राय और बी आर चोपडा दोनों “O.K.-O.K वाह-वाह ” कहते रहे। बस अब एक-दो किरदार ही बचे थे। इन्द्र ने गर्व से नारद की ओर देखते कहा- ” देखा नारद, मेरे देवताओं का कमाल! हमने बहुत देखे ऐसे बलराज – वलराज साहनी को। अब तो परीक्षा भी पूरी होने को है। “
” पूरी होने को है, पर पूरी हुई नहीं ” नारद के इतना कहते ही दो देवता सिर झुकाये आये और बोले-” क्षमा करें देवराज । हम हार गये।
“दो बीघा जमीन ” के शम्भू महतो व काबुलीवाला का रोल कोई देवता करने को तैयार नहीं । तीनों लोक हो आये।
सभी कहते हैं कि ये रोल बलराज साहनी के सिवा इसे कोई नहीं कर सकता। हमें क्षमा करे देवराज ।”
इन्द्र फिर झुकाये सोचते रहे। तब नारद ने हँसते हुए कहा-” क्या सोच रहै हो इन्द्र ? कहीँ ऐसा न हो कि ये दो बीघा जमीन व काबुलीवाला के रोल की ताकत लेकर यदि इसने तुम्हारा यानी इन्द्र का रोल कर लिया तो, ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनों इसे ही असली इन्द्र मानकर इसे तुम्हारा इन्द्रासन सौंप दे। और तुम पर दफा चार सौ..बीस , नहीं -नहीं,श्रीचारसो…बीस लगा दे। “
” नहीं-नहीं । गर ऐसा हुआ तो मैं …., हे देवर्षी हे महर्षी, हे महामुनि अब आप ही कोई रास्ता निकालिये। हाथ जोड़ते हुए इन्द्र ने कहा।
” ना..रायण-ना..रायण “। नारदजी ने शरद जोशी की तरह व्यंग्य से मुस्कुराते हुए इन्द्र की ओर देखा। जो कुछ देर पहले तक नारद-नारद बोलता था, जब बोलती बंद हुई तो देवर्षी-महर्षी- महामुनि बोलने लगा। इसे कहते हैं- ” वक्त पड़ा बाँका तो….,हँसते हुए नारदजी बोले-“
हम तो पहले ही कह रहे वे, इसे अभिनय का देवता बना ले । इससे तुम्हारा देवलोक और भी समृध्द होगा। दिलीप कुमार से भी तो बात करने वाला कोई तो देवलोक में होना चाहिए न। ना..रायण-ना..रायण।”
” आप ठीक कहते हैं ऋषिराज। ” हाथ जोड़ते हुए इन्द्र बोले।
दोनों बलराज साहनी के पास आकर कहते हैं-”
हे अभिनय के देवता, देवलोक में आपका स्वागत है। आइये- पधारिये “
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© श्री घनश्याम अग्रवाल
(हास्य-व्यंग्य कवि)
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