श्री हिमांशु राय
(ई-अभिव्यक्ति के पाठकों के साथ समय समय अपने अनुभव और साहित्य को साझा करने के लिए संस्कारधानी जबलपुर के वरिष्ठ नाट्यकर्मी एवं साहित्यकार श्री हिमांशु राय जी का हृदय से आभार। आप इप्टवार्ता के संपादक एवं विवेचना थियेटर ग्रुप के सचिव भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा।)
व्यंग्य – डोरीलाल की चिन्ता – जेबकतरा – श्री हिमांशु राय
डोरीलाल से एक व्यक्ति मिला। वो बहुत प्रसन्न था। उसने बताया कि अभी अभी उसकी जेब कट गई है। इसलिए बहुत खुश है। उसने बताया कि उसकी रोज जेब कटती है। आज सुबह से नहीं कटी थी तो वह बहुत चिन्तित था मगर दोपहर तक कट गई तो अब उसने चैन की सांस ली है। उसने बताया कि पिछले कई वर्षों से उसे जेब कटवाने की आदत पड़ गई है और जिस दिन जेब नहीं कटती वो बैचेन हो उठता है। उसके अच्छे स्वास्थ्य और खुश रहने का राज है रोज जेब कटवाना। उसकी जेबकतरे से लगन लग गई है।
डोरीलाल को भरोसा नहीं हुआ। मैंने पूछा कि ये क्या बात हुई ? ऐसा कैसे हो सकता है। जिस बात पर तुम्हें गुस्सा आना चाहिए, उस पर तुम खुश हो रहे हो ? उसने कहा शास्त्रों में कहा गया है कि क्रोध पाप का मूल है और पाप मूल अभिमान। तो मुझे किसी बात पर गुस्सा नहीं आता। अब वैसे भी मेरी चिन्ता जीवन जीना नहीं है। जीवन से पीछा छुड़ाना है। मुझे मोक्ष चाहिए। मुझे मुक्ति चाहिए। मैं ऐसी जगह जाना चाहता हूं जहां कोई जेबकतरा न हो।
मैंने कहा कि तुमने अपने रोग की पहचान में गलती की है। तुम अपने को दोषी मान रहे हो जबकि तुम्हारी इस हालत का जिम्मेदार तो जेबकतरा है। तुम जेबकतरे की गर्दन नापने के बजाए अपनी गर्दन नापने की सोच रहे हो। ये ठीक नहीं है। क्या तुम जेबकतरे को पहचानते हो ?
उसने कहा – बिल्कुल पहचानता हूं। मैं ही क्या हर कोई उसे पहचानता है। वो खुद भी अपनी पहचान बताने में कभी संकोच नहीं करता। उसकी फोटो हर जरूरी और गैर जरूरी जगह पर लगी है। उसने खुद लगवाई है। उसे बड़ा शौक है। अपनी फोटो लगवाने का।
मैं समझ गया कि यह आदमी भगवान से खार खाये बैठा है। इसलिए सर्वशक्तिमान परम पिता परमेश्वर की बात इस तरह से कर रहा है। मैंने कहा देखो भाई ईश्वर के मामले में इस तरह की बातें उचित नहीं हैं। धार्मिक मामला अलग है। भगवान की फोटो श्रद्धावश लोग जहां तहां लगा देते हैं। जेबकटी के मामले में भगवान को बीच में लाने की जरूरत नहीं है। आज देश में कई लोग जेब कतरने जैसे छोटे छोटे उद्योग व्यवसाय में लगे हैं। वे प्रभावशाली हैं। उनमें से कोई तुम्हारी भी जेब काट रहा है। तुम्हारी शिकायत वाजिब है। मगर डोरीलाल को ये बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होगा कि तुम इस छिछोरे जेबकतरे की बराबरी ईश्वर से करो।
अब उसे गुस्सा आया। उसने कहा मि. डोरीलाल मैं भी यही कह रहा हूं कि भगवान और उस जेबकतरे को एक न समझो। वो कोई भगवान नहीं है। वो छिछोरा जेबकतरा ही है। मैं भी जानता हूं और मेरे जैसे सारे लोग जानते हैं। जैसे नशेबाज को नशे में कोई बुराई नहीं दिखती। जैसे शराबी को शराब में कोई बुराई नहीं दिखती वैसे ही रोज हमारी जेबकटती है मगर हमें जेबकतरे में कोई बुराई नहीं दिखती। हम जेब कतरे के भक्त हो गए हैं। अब बात काफी आगे बढ़ गई है। अब तो हमें जेब कटवाने में तरह तरह के फायदे दिखाई देने लगे हैं।
जेब कटवाना अब एक सामाजिक राजनैतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बड़े बड़े वकील, जज, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, अधिकारी, व्यापारी सब कूद कूद कर जेब कटवाते हैं। जो खुद दूसरों की जेब काटते हैं वो भी उस जेबकतरे से जेब कटवाते हैं। जिसकी नहीं कटती वो अपने को कमतर समझने लगता है। उसे लगता है कि कल तक वो निपट जाएगा। वो दौड़कर जेबकतरे के पास जाकर गिड़गिड़ाता है मेरी जेब काट लो। जब तक कट नहीं जाती पैरों से लिपटा रहता है।
जेबकतरा परेशान है। आज देश में हर कोई जेब कटवाने के लिए तैयार खड़ा है। जेब न कटे तो लड़ाईयां हो जाती हैं। कटवाने की ऐसी होड़ लगी है कोई छूटना नहीं चाहता। सब चाहते हैं जेब कट जाए। इसीलिए गांव गांव शहर शहर महानगर चंहुओर विराट सामूहिक जेबकट सम्मेलन आयोजित होते हैं। उसमें हजारों लाखों लोग जाकर अपनी जेब कटवाते हैं। गांव गांव में पुड़ी भाजी के पैकेट के साथ मुफ्त बसों में भरकर जेब कटवाने वालों को सम्मेलन में लाया जाता है। जेब कटने के बाद सब लोग खुशी खुशी फोटो वाला झोला लेकर अपने अपने घरों को जाते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखकर देवगण ऊपर से ईर्ष्या के फूल बरसाते हैं। उन्होंने जिस सृष्टि का सृजन किया उसमें जेबकतरे के प्रति अगाध श्रद्धा देखकर देवगण जलभुनकर राख हो जाते हैं। बहुत सारे छुटभैइये जेबकतरे गुरूपूर्णिमा के अवसर पर अपने आराध्य जेबकतरे का पूजन करते हैं और अपनी ’मेहनत’ की कमाई का अंश उन्हें गुरू दक्षिणा के रूप में श्रद्धापूर्वक चढ़ाते हैं।
डोरीलाल ने पूछा कि जेबकतरे को पहचान लेने के बाद भी जेब कटवाते रहते हो, रोज कटवाते हो, तुम आदमी हो या कीट पतंगा ? तुम्हारी मेहनत की कमाई कोई लूट रहा है और तुम मजे कर रहे हो ? तुम विरोध क्यों नहीं करते ? इंकार कर दो हम नहीं कटवायेंगे जेब। कोई जबरदस्ती है ?
डोरीलाल जी, हम लोग छोटे लोग हैं। हम क्या विरोध करेंगे। जेबकतरे के पास पुलिस, अदालत, वकील, जज, बड़े बड़े अधिकारी व्यापारी हैं। हमारे लिए बोलने वाला कौन है ? जो लोग बोल सकते हैं वो खुद लपक लपक कर जेब कटवा रहे हैं। हम इसी लायक हैं कि ठगे जाएं। जेब कटवाना ही हमारा भाग्य है। कम से कम हमें इस लायक तो समझा गया है कि हमारी जेब काटी जाए। उल्टे हमें तो डर लगा रहता है कि जेबकतरा कहीं गुस्सा होकर हमारी जेब काटना बंद न कर दे। हम तो कहीं के न रहेंगे।
हमारे पास कोई काम नहीं है। बचा है तो केवल एक काम – जेब कटवाना।
डोरीलाल ’जेबकतरा प्रेमी’
© श्री हिमांशु राय
जबलपुर, मध्यप्रदेश
14 02 2026
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






