श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” ।)
☆ शेष कुशल # ६२ ☆
☆ व्यंग्य – “कोरट-कचहरियों की सम्मानजनक विदाई का स्वर्णिम दिन…” – शांतिलाल जैन ☆
सूरज आज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा. लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में मुल्क का भ्रष्टाचारियों, अपराधियों से मुक्त हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.
आज हुआ ये श्रीमान् कि इसके पहले कि आला कचहरी में वकील सा. अपने मुवक्किल के निर्दोष होने की अपील-दलील पेश कर पाते, जिरह होती, गवाहों सबूतों की बिला पर अपने मुवक्किल को दोषमुक्त करा पाते – प्रॉसिक्यूशन ने केस ही वापस ले लिया!!! अभियुक्त पिछली रात नौ बजे तक अपोजिशन में था, अगली सुबह नौ बजे हाकिम के दल में शामिल हो गया. सुबह का भूला था श्रीमान्, अगले दिन सुबह घर आ गया था, सो आप उसे भूला नहीं कह सकते. कभी मिला करती थी क्लीन चिटें अदालतों से, अब हाकिम ने मुकदमा वापिस लेकर उसकी जरूरत ही ख़तम कर दी है. रख लें अदालतें अपनी चिटें अपने पास.
हाकिम ने पार्टी का बड़ा और भव्य दफ्तर बनवाया है मगर बाहर डोर-बेल नहीं लगवाई. दरवज्जे पे न्याय का घंटा जो लटकवा लिया है. बजाईए. अंदर जाईए. क्लीन चिट पाईए और पाईए एक मलाईदार ओहदा भी. स्मार्ट लीडर्स करप्शन करके कारागार का रुख नहीं करते, उनके गेट पर लटका न्याय का घंटा बजा लेते हैं और सेफ झोन में प्रवेश कर जाते हैं. ‘सत्तापक्ष में कोई भ्रष्टाचारी नहीं होता और विपक्ष में कोई ईमानदार नहीं होता.’ न्यायशास्त्र का ये नया सिद्धांत है, जो इस अवधारणा को स्थापित करता है कि एक विपक्षमुक्त मुल्क ही भ्रष्टाचार मुक्त मुल्क का पर्याय होता है. देखते देखते न विपक्ष में न कोई नेता बचा है न मुल्क में भ्रष्टाचार का कोई आरोपी. इस तरह आज का मुकदमा दीवानी अदालतों में आख़िरी मुकदमा साबित हुआ.
क्रिमिनल केसेस पहले ही अदालतों में पेश होना बंद हो चुके थे. इसे आप कल्लू मिर्ची के केस से समझिए. उसकी बदमाशी का मुआमला सामने आया और हाकिम के नुमाईंदे जेसीबी पर सवार होकर निकल पड़े. देखते देखते उसका मकान ध्वस्त कर दिया गया. लो साहब, हो गया न्याय. धरा रह गया सत्र न्यायालय और बैठे रह गये ‘युवर ऑनर’. पड़ीं रह गईं एफआईआर, तफ़्तीश, साक्ष्य, विवेचना, केसडायरी, रिमांड, जमानत, चार्जशीट, भारतीय न्याय संहिता, वकील, मुवक्किल. कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अब ना हाकिम पड़ता है न उसके नुमाईंदे. उनकी मर्ज़ी ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ है. मुल्क के आईन में अब अदालतों की जरूरत ही नहीं बची. पूरी न्यायपालिका एक झटके में बेरोज़गार हो गई है. वकीलों, न्यायाधीशों, कचहरी के कारकूनों का रोज़गार छिन गया हैं. जस्टिस सर की बेंच पर नया कोई केस लिस्ट हो नहीं रहा. कारकून खाली बैठे हैं. वकील मुवक्किलों की तलाश में भटक रहे हैं. ‘हाजिर हो’ की आवाजें गुम हैं, निस्तब्ध निरापद सन्नाटा पसरा पड़ा है. आज का दिन न्यायपालिका की सम्मानजनक विदाई का दिन है.
लोकतंत्र की स्थापना के आठ दशक से भी कम में ही न्यायपालिका की जरूरत का ख़त्म हो जाना कोई छोटी मोटी कामयाबी नहीं है. ऐसी कामयाबी उसी दिन मिला करती है जिस दिन सूरज पूरब से ना निकला हो. मुझे पक्का यकीन है आज सूरज पूरब से तो नहीं ही निकला होगा.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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