श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ।)
☆ शेष कुशल # ६६ ☆
☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” – शांतिलाल जैन ☆
आईए श्रीमान्, ये जो आप देख रहे हैं, आज़ाद भारत में इसे प्रदर्शन करने की सबसे मुफ़ीद जगह माना जाता हैं. प्रदर्शनकारियों का मक्का : दिल्ली का जंतर-मंतर. समझ लें कि ये चित्रकार के सपनों की ‘जहाँगीर आर्ट गैलेरी’ है जहाँ वह जीवन में कम से कम एकबार अवश्य नुमाइश लगाना चाहता है. किए होंगे आपने जिंदगीभर प्रदर्शन हर जगह, मगर जंतर-मंतर पर नहीं किया तो आपकी प्रोटेस्टर-लाइफ फ़िज़ूल है. जंतर-मंतर देश में पाँच जगह पर हैं, बट डेल्ही इज डिफरेंट. बाकी जगह जंतर-मंतर हैं मगर प्रोटेस्टर्स नहीं हैं. जहाँ प्रोटेस्टर्स हैं वहाँ जंतर-मंतर नहीं हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर भी हैं, प्रोटेस्टर्स भी हैं, कवर करनेवाला मेनस्ट्रीम मीडिया भी है और दोगला निज़ाम भी. वह दिन के उजाले में प्रदर्शन की अनुमति देता है, रात के अँधेरे में तम्बू उखाड़ फैंकता है. दिन में लोकतंत्र मज़बूत होता है. लोकतंत्र मज़बूत करने का काम देश में अगले दिन भी बचा रहे इसलिए रात में इसे फिर से कमज़ोर कर देता है.
लोकतंत्र में प्रोटेस्ट्स का होना जितना जरूरी है उसे कुचला जाना उससे भी ज्यादा जरूरी है. प्रोटेस्ट करने से डेमोक्रेसी ऑक्सीजन पाती हैं, कुचल दिए जाने से मज़बूत होती है. इसलिए हर सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है कि वो लोकतंत्र को पहले कुछ प्राणवायु पा लेने दे फिर उसे कीलें ठुकी हुई लाठियों से मज़बूत बनाने के लिए दौड़ पड़े. प्रहरी ड्रेस पहन पाए तो ठीक, नहीं पहन पाए तो सादी वर्दीवाले साथ में ले जाकर भी डेमोक्रेसी को ताकत दी सकती है. लोकतंत्र सभ्यता के चरम पर तब पहुँचता है जब कोई ‘ही’ पुलिसवाला किसी ‘शी’ प्रोटेस्टर के निजी अंगों में करंट छोड़नेवाली बेटन पुश करता है. पत्थर कभी पुलिसवालों को लगता है कभी प्रदर्शनकारियों को. और कोई घायल हो न हो लोकतंत्र लहूलुहान अवश्य होता है.
जंतर-मंतर निज़ाम के लिए भी मुफीद जगह है. जब वह लोकतांत्रिक दिखना चाहता है, तब प्रदर्शन की अनुमति देता है. जब अधिक लोकतांत्रिक दिखना चाहता है तब उसी प्रदर्शन को कुचल देता है. प्रदर्शनकारियों को निज़ाम से डर नहीं लगता, उसके अधिक लोकतांत्रिक हो उठने से लगता है. जंतर-मंतर पर एक सूर्यघड़ी है जो परछाई के झुकाव से बता देती है कि किस प्रोटेस्टर को कब लाठी खिलाना है, कब जूस पिलाना है. इंटेलिजेंस के खगोलशास्त्री सूर्यघड़ी की परछाई देखकर सरकार को बता देते हैं – कौन कब खतरनाक हो सकता है उसे किस दिन, कितने बजकर कितने मिनट्स, कितने सेकंड्स पर जेल में डालने के योग बन रहे हैं.
एक जंतर-मंतर मेरे शहर उज्जैन में भी है. आलसी और सुस्त. मैंने वहाँ लोकतंत्र मज़बूत होते हुए शायद ही कभी देखा हो. इसीलिए हमारे शहर के पुलिसवाले जब जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत होता हुआ देखते हैं तो मज़बूती के यज्ञ में आहुति देने को मचल मचल उठते हैं. हरबार उनकी मचलन निराशा में बदल जाती है. उनके पास लाठी है मगर चार्ज करने के पॉइंट्स नहीं हैं, पैलेट्स हैं, गन हैं, मगर सब्जेक्ट नहीं है. उनकी अपनी आँख का पानी भले सूख गया हो मगर दूसरों की आँखों से आँसू निकल आए, दागने को गैस के गोले हैं. वाटर केनन है मगर चलाने के मौके नहीं है. किस्मतवाली है दिल्ली की पुलिस, लोकतंत्र मज़बूत करने में योगदान दे पा रही है. उसके पास जंतर-मंतर भी है, प्रोटेस्टर्स भी, झूठ बोल जाने की बेशर्मी भी है. और लाठी, गन, गोले तो हैं ही. इसी बरस रिटायर होने जा रहे एक पुलिस अंकल ने कहा – ‘लगता है आँसू गैस का गोला छोड़ पाने की हसरत मन में लिए लिए ही रिटायर होना पड़ेगा.’
मैंने कहा – “अन्याय तो शेष मुल्क में भी कम नहीं हैं पुलिस अंकल, मगर क्या है कि आमजन ने अन्याय के साथ जीना सीख लिया है. समझदार लोग विरोध, निजता और मानवाधिकार जैसी बातों पर लेक्चर सुनने ज़रूर जाते हैं, चच्च-चच्च करते हैं, फिर आत्मतुष्ट होकर बैठ जाते हैं. टीवी पर मंजर देखकर उबलते तो हैं लेकिन शहर के जंतर-मंतर पर पहुँचकर लोकतंत्र बचाने उपायों में शरीक नहीं हो पाते.”
बहरहाल, धैर्य रखे जयपुर, बनारस, उज्जैन की पुलिस और लाठी को तेल नियमित रूप से पिलाती रहे, कौन जाने कब उन्हें उनके जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत करने के असाइनमेंट में लगा दिया जाए.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
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