image_print

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

(डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं।आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख  “हमारी लोक संस्कृति और जनमानस में बसा चाँद”.)

☆ किसलय की कलम से # 31 ☆

☆ हमारी लोक संस्कृति और जनमानस में बसा चाँद ☆

चन्द्रमा और लक्ष्मी दोनों ही समुद्रमंथन से निकले होने के कारण भाई-बहन कहलाते हैं। भगवान विष्णु हमारे जगत पिता और देवी लक्ष्मी हमारी जगत माता हैं। इस रिश्ते के कारण ही देवी लक्ष्मी के भाई चन्द्र देव हम सबके मामा हुए। यही कारण है कि पूरा हिन्दु-विश्व चाँद को “चन्दा मामा” कहता है।

अन्तरिक्ष में पृथ्वी के सबसे निकट होने के कारण चाँद अपनी चाँदनी और अनेक विशेषताओं के कारण प्राणिजगत का अभिन्न अंग है। चाँद के घटते-बढ़ते स्वरूप को हम चन्द्रकलाएँ कहते हैं। इन्हीं कलाओं या स्थितियों को हमारे प्राचीन गणितज्ञों एवं ज्योतिषाचार्यों ने चाँद पर आधारित काल गणना विकसित की। प्रतिपदा से चतुर्दशी पश्चात अमावस्या अथवा पूर्णिमा तक दो पक्ष माने गए। शुक्ल और कृष्ण दो पक्ष मिलकर एक मास बनाया गया है। आज हिन्दु समाज के सभी संस्कार अथवा कार्यक्रम इन्हीं तिथियों के अनुसार नियत किए जाते हैं। आज भी धार्मिक, श्रद्धालु एवं समस्त सनातनधर्मी जनसमुदाय काल गणना और अपने अधिकांश कार्य चन्द्र तिथियों के अनुसार ही करते हैं। दिन में जहाँ सूर्य अपने आलोक से पृथ्वी को जीवन्त बनाये हुए है, वहीं चाँद रात्रि में अपनी निर्मल चाँदनी से जन मानस को लाभान्वित करने के साथ ही अभिभूत भी करता है।

लोक संस्कृति में आज भी चाँद का महत्त्व सर्वोपरि माना जाता है। दीपावली, दशहरा, होली, रक्षाबंधन, शरद पूर्णिमा, गणेश चतुर्थी, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, सोमवती अमावस्यायें, कार्तिक पूर्णिमा, जैसे सारे व्रत या पर्व चाँद की तिथियों पर ही आधारित हैं। इनमें से शरद पूर्णिमा तो मुख्यतः चाँद का ही पर्व कहलाता है। इस दिन की चाँदनी यथार्थ में अमृत वर्षा करती प्रतीत होती है।

यदि हम समाज की बात करें तो आज भी छोटे बच्चों को चाँद की ओर इशारा कर के बहलाने का प्रयास किया जाता है। “चन्दा मामा दूर के, पुये पकाए बोर के” जैसे काव्य मुखड़ों से सारा समाज परिचित है। वहीं आज भी भगवान कृष्ण जी पर केन्द्रित गीत के बोल “मैया मैं तो चन्द्र खिलौना लैहों” किसे याद नहीं है। दूज के चाँद की सुन्दरता अनुपम न होती तो भगवान शिव इसे अपने भाल का श्रृंगार ही क्यों बनाते और वे चंद्रमौलि या चन्द्रशेखर कैसे कहलाते। यहाँ बुन्देली काव्य की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं:-

विष्णु को सारो, श्रृंगार महेश को,

सागर को सुत, लक्ष्मी को भाई .

तारन को पति, देवन को धन,

मानुष को है महा सुखदाई ॥

इन पंक्तियों में चाँद को मानव और देवताओं सभी के लिए सुखदाई बताया गया है।

इस तरह चाँद की तुलनाएँ, उपमाएँ और सौन्दर्य वर्णन में उपयोग को देखते हुए लगता है कि यदि चाँद नहीं होता तो कवि-शायरों के पास एक विकट समस्या खड़ी हो जाती। चौदहवीं का चाँद हो, चन्दा है तू, मेरा सूरज है तू, तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी, चाँद सी महबूबा हो मेरी, या फिर मैंने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी … आदि सदाबहार गीत हम आज न ही सुन पाते और न ही गुनगुना पाते।

प्रारम्भ से ही चाँद के प्रति प्राणिजगत का गहरा लगाव रहा है। यदि हम यहाँ पर ये कहें कि चाँद के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है, तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। लोग कल्पना करते थे कि चाँद पर कोई बुढ़िया चरखा चला रही है या झाड़ू लगा रही है। भले ही आज मानव चाँद पर जा चुका है पर उसकी विशेषताओं और महत्त्व में अभी तक कोई फर्क नहीं पड़ा है। चाँद की शीतलता और उसका तारों भरे आकाश में शुभ्र चाँदनी बिखेरना, किसे नही भाता। मेरे ही शब्दों में :-

पर्वतों कि चोटियों पे आ के

बादलों के घूँघटों से झाँके

हो गई ये रात भी सुहानी

चाँद तेरी रौशनी को पा के …

चाँद जहाँ सुन्दरता का प्रतीक माना जाता है, वहीं उस पर दाग होने की कमी भी बताई जाती है। हमारे ग्रंथों में एक स्थान पर तो उसे देखने से ही चोरी के कलंक का कारण भी बताया गया है। इसी सन्दर्भ में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा शुक्लपक्षीय भाद्रपद की चतुर्थी के चाँद को देख लेने पर उनके ऊपर “स्यमन्तक मणि” की चोरी का आरोप भी लगा दिया गया था, भले ही बाद में वे निर्दोष सिद्ध हो गए। कहते है चाँदनी रात का सुरम्य, शांत और एकांतप्रिय माहौल कवि-शायरों की साधना के लिए उपयुक्त होता है। वहीं अशांत मन के लिए शान्ति के लिए भी  ऐसे वातावरण सुखद होता है :-

एक शाम सुनसान में,

चाँद था आसमान में।

गुमसुम सा बैठा रहा,

न जाने किस अरमान में।।

चलती रही शीतल पवन,

रात बनी रही दुल्हन।

शान्त नहीं था मन मेरा,

थी अजीब सी वो उलझन।।

हम लोक संस्कृति, काव्य, शायरी, चित्रकारी, धर्म, अथवा समाज कहीं की भी बात करें, चाँद हमारे करीब ही होता है। यह शत-प्रतिशत सत्य है। हम ईद के चाँद की बात करें अथवा करवा चौथ के चाँद की। ये व्यापक और धार्मिक पर्व मुख्यतः चाँद के दर्शन पर ही आश्रित होते हैं। हमारा समाज इन्हें कितनी आस्था और विश्वास के साथ मनाता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

लोक संस्कृति में रचा-बसा, भगवान शिव के मस्तिष्क पर शोभायमान, कवि-शायरों की शृंगारिक विषयवस्तु, मनुष्य और देवताओं के सुखदाई चाँद की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

image_print
3.5 2 votes
Article Rating

Please share your Post !

0Shares
0
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments