श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 137 ☆ देश-परदेश – हमारे सहायक: केशकर्तक ☆ श्री राकेश कुमार ☆
साधारण भाषा में हम लोग इनको नाई या नाऊ भी कहते हैं। मुंडन से जीवन के अंतिम समय तक इनकी सेवाएं ली जाती हैं।
कुछ दिन पूर्व एक केशकर्तक की सेवा के लिए वेटिंग में थे। अब तो उनकी दुकान पर ए सी की सुविधा भी है। दो तीन लोग और भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
नए ग्राहक भी प्रवेश करते हुए पूछ रहे थे, कि कितना समय लगेगा ? क्या युवा या वृद्ध कोई भी इंतजार नहीं करना चाहता है, सब को मोबाइल में आए हुए मैसेज जो पढ़ने रहते हैं।
करीब पंद्रह वर्ष का एक बच्चा जब नाई की कुर्सी पर बैठा, तो उसने मोबाइल से अपने पिता से बात करवाई। पिता ने कहा बाल एकदम छोटे कर देना। इतना ही नहीं कटिंग पूरी हो जाने पर वीडियो कॉल के बाद पिताश्री ने नाई को और छोटे बाल करने के निर्देश भी दिए। टेक्नोलॉजी का सही उपयोग इसी को कहते है।
ये सुनकर हमें अपने बचपन की याद आ गई। नाई के यहां से जब बाल कटवा कर घर जाते थे, तो हमारे पिताजी वापिस नाई की दुकान पर भेज देते थे, कि बाल और छोटे करवा कर आओ। हमारा नाई इसलिए पहले से ही एकदम छोटे बाल कर देता था, ताकि दुबारा हम उसकी दुकान पर ना आएं। आज भी भारतीय पिता इस पुरानी परंपरा को बखूबी निभा रहे हैं।
केशकर्तक पूर्व में कैंची को मुख्य औजार के रूप में उपयोग करते थे। कैंची की कतर कतर आवाज़ में भी नाई दुनिया भर के रोचक किस्से नमक मिर्च लगा कर सुना देते थे। आजकल बैटरी चलित छोटी मशीन कम आवाज़ वाली उपयोग में आ रही है। इससे नाई की उंगलियों को भी आराम मिलता है। नाई भी मुंह में गुटका दबा कर अब कम ही बोल पाते हैं।
नाई के ग्राहक भी बीच बीच में मोबाइल पर तिरछी निगाह मार लेते हैं, शायद कोई नए प्रकार का मैसेज आ गया हो। ये भी हो सकता है, आप लोगों में से हमारा ये आलेख भी कोई बाल कटवाते हुए पढ़ रहा हो।
© श्री राकेश कुमार
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