श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “द्रौपदी का चीर”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 232 ☆
🌻लघुकथा 🔥द्रौपदी का चीर🔥
लगातार बारिश से चारों तरफ पानी ही पानी, देखते-देखते शहर, गाँव, नदी – नाले सभी पानी से जलाजल भर गए।
झुग्गी झोपड़ियों में भी जीवन बढ़ता, पलता, संवरता और प्रफुल्लित होता है। सूखे मौसम में सब कुछ अच्छा लगता है। तेज हवा का झोंका तपती सूर्य की किरणें, सब सहन हो जाता है, परंतु बारिश में जहाँ पानी ही पानी। वहाँ पर एक घास फूस पन्नी टूटे-फूटे सामानों से ढकी, झोपड़ी जहाँ पर वह अपने पति के साथ, पति क्या कहना दो अनाथ को एक साथ मजदूरी करते-करते दो जून की रोटी ने हमसफर बना दिया।
जहाँ तन, मन, धन से वह एक जान हो गए थे। पति दो दिन से तेज ज्वर से पीड़ित था। गरीबी की मार और बारिश का खेल। सभी कुछ गीला, आटा चाँवल की तो बात ही न करें, चूल्हे में गीली लकड़ियाँ जलाकर वह आसपास के वातावरण को गरम करना चाहती थी।
परंतु सिसकती साँसे और सुलगती लकड़ियाँ, दोनों अपनी-अपनी कहानी कह रही थी।
पास में जड़ी बूटी बेचने वाला भी झोपड़ी बनाकर रहता था। परंतु उसकी झोपड़ी सूखी क्योंकि चारों तरफ से मोटी पल्ली, मिट्टी की दीवार से ढका हुआ था।
अपनी झोपड़ी पर रहता तो था, परंतु आँखें चौबीसों घंटे उस झोपड़ी पर रहती जिसमें रूपा अपने पति के साथ रहती थी।
दियासलाई की रोशनी दरवाजे पर दिखाई दी। रूपा काँपते हुए बोली– मेरे पति को दवाई देकर बचा लीजिए। आज वह मन ही मन खुश हो रहा था मौका और जरुरत दोनों है।
कुछ जड़ी – बूटी लेकर वह वहाँ पहुंच गया, नब्ज देख कर बोला – – – इसे तो ताप देना पड़ेगा। आग सुलगनी चाहिए।
कुछ जलाने का सामान ले आओ। रूपा ने चूल्हे की गीली लकड़ियाँ लगाई थी, उसको जलाने के लिए अपने शरीर पर उतना ही साड़ी का पल्ला बचाया जितनी जरूरी थी।
शेष साड़ी फाड़ कर चूल्हे में जला दी। लकड़ियाँ सुलग उठी।
ताप से पति को ज्वर और ठंड से आराम मिला।
परंतु रूपा आज चीर फाड़ते समझ चुकी थी कि– इस बारिश में झोपड़ी की आवाज, सुलगती चीर, शायद कलयुग है, कान्हा जी को सुनाई नहीं दिया होगा।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





