श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 233 ☆
🌻लघु कथा🌻 ❤️ प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है❤️
झमाझम बारिश हो रही है। टीवी पर न्यूज़ देखते-देखते सूरज उठा और घर के एक कोने में जाकर शुभी को फोन लगाया। शुभी गाँव में ही रहती है। घर से दूर पर ऐसा नहीं कि बारिश में ना आ सके।
सूरज ने कहा– शुभी बारिश बहुत तेज हो रही है। घर में माँ की तबीयत खराब है। खाना भी नहीं बना है, शायद बन भी ना पाए क्या करूं?
शुभी और सूरज दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे। चर्चा पूरे गाँव में थी। देवउठनी के बाद विवाह होने वाला है। शुभी ने कहा – – आप चिंता न करें मैं अभी आ रही हूँ।
घर में अम्मा – बाबूजी को बता अपनी स्कूटी ले रेनकोट पहन कर वह मूसलाधार बारिश में सूरज के घर पहुंच गई। वहाँ देखा सूरज की माँ चौके में गरम-गरम रोटियां सेक रही थी।
शुभी तो अवाक रह गई। सूरज ने बताया – माँ शुभी आई है। माँ ने दिल खोलकर शुभी का स्वागत किया।
कैसे आ गई बेटा इतनी बारिश में घर में सब ठीक तो है?
शुभी ने माँ के आँचल से अपना सिर पोछती बोली– माँ यहाँ से निकल रही थी बारिश की वजह से रुक गई।
अब आ गई हो तो खाना खाकर जाना।
– जी। शुभी ने कहा!! सब ने मिलकर खाना खाया। जाते समय शुभी ने एक कागज सूरज के हाथ में दिया “प्रेम हमेशा हृदय की सुनता है समाचार की नहीं और समाचार को लेकर कभी मेरी परीक्षा लेने की कोशिश नहीं करना। करोगे, तो मैं हमेशा जीत में ही रहूंगी।“
सूरज समझ गया। उसकी पसंद औरों से बहुत अलग है।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





