श्री राकेश कुमार
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 139 ☆ देश-परदेश – वही बनेगी तरकारी! जो आदेश होगा सरकारी!! ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे देश में तो उपरोक्त कहावत हास्य विनोद के लिए प्रयोग की जाती हैं। हम सब लोग तो अपनी मर्जी के मालिक होते है, अधिकतर नियम तो किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं। नियम तो तोड़ने के लिए बनाए जाते हैं, ऐसा कहकर हम नियम का पालन नहीं करने वाले को प्रोत्साहित करते हैं।
उपरोक्त साइन बोर्ड, अमेरिका के एक सार्वजनिक स्थल पर लगा हुआ था। जिस देश में कुत्ते जैसा प्राणी भी नियमों से बंधा हुआ हो, तो मानव जाति कहना ही क्या ?
कुत्ते की रस्सी/चैन की अधिकतम लंबाई छह फुट से अधिक नहीं रख सकते हैं। यहां तो कुत्ते चैन में बंधे हुए ही पाए जाते हैं। गली के कुत्ते जिसको सभ्य लोग स्ट्रीट डॉग कहते है, यहां ये नस्ल नहीं पाई जाती हैं। यहां के कुत्ते कभी भी स्वच्छंद रूप से विचरण नहीं कर सकते। कभी किसी वाहन के पीछे भी कुत्ते दौड़ते हुए नहीं मिलते। इसलिए यहां के लोग कुत्तों को एक्सरसाइ करने के लिए उनके जिम लेकर जाते हैं। बहुत अमीर लोगों के कुत्ते के लिए उनका निजी ट्रेनर घर पर ही आता है।
इसके अलावा यहां के कुत्ते भौंकते हुए भी नहीं दिखते। हमारे देश में तो कुत्ते और मानव आवश्यकता से अधिक ही भौंकते हैं। मोबाइल पर भी सार्वजनिक स्थानों पर स्पीकर के माध्यम से वार्तालाप करने का चलन बढ़ रहा है।
हमारे देश में अमरीकी राष्ट्रपति आदि के आगमन के समय वहां के सुरक्षा कुत्ते भी साथ ही आते हैं। उनके रहने के लिए भी ए सी कमरे की व्यवस्था की जाती है। हमारे देश के स्ट्रीट डॉग तो किसी गरीब व्यक्ति के साथ ही अपना जीवन यापन कर लेते हैं। दुनिया के सबसे अमीर देश के कुत्ते भी “अमीर कुत्ते” ही कहलाते हैं।
© श्री राकेश कुमार
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