डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक ऐतिहासिक संस्मरण – ‘परसाई जी, कुछ यादें‘। इस ऐतिहासिक रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 300 ☆
☆ संस्मरण ☆ परसाई जी, कुछ यादें ☆
मुझे करीब बीस साल तक परसाई जी के आवास के बहुत नज़दीक रहने का मौका मिला। कभी भी पैदल चलकर उनके पास पहुंच जाता था। परसाई जी पैर खराब होने के कारण बाहर के कमरे में पलंग पर लेटे रहते थे। वही उनका स्थायी स्थान था। कहीं आने-जाने का सवाल नहीं। दरवाज़े पर एक पर्दा रहता था। दरवाज़ा कुछ खास समय पर ही बन्द होता था, अन्यथा परसाई जी के पास कभी भी पहुंचा जा सकता था। सिर्फ पर्दा उठाकर ‘आ सकता हूं?’ कहने की ज़रूरत होती थी। परसाई जी कभी किसी को मिलने के लिए मना नहीं करते थे। जो भी आता उसका स्वागत करते थे और सहज भाव से उससे बात करते थे। उन्होंने वश भर कभी किसी को दुखी या निराश नहीं किया। बहुत से लोग जबलपुर के मार्बल रॉक्स सहित अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए आते थे और लगे हाथ परसाई जी के ‘दर्शन’ के लिए भी आ जाते थे। कोई परिचय न होने के बावजूद भी परसाई जी उनसे प्रेम से मिलते थे। उन्हें दिक्कत सिर्फ उन्हीं लोगों से होती थी जो उनके विचारों के विरोधी थे।
पैर खराब होने से पूर्व परसाई जी रोज़ ही सवेरे मित्रों से मिलने के लिए निकल जाते थे। जब वे निकलते तो उनका व्यक्तित्व देखते ही बनता था। लंबा कद, गौर वर्ण, प्रशस्त ललाटऔर शरीर पर काली शेरवानी। जब वे सड़क पर चलते तो लोगों की गर्दनें मुड़ती थीं। किसी कार्यक्रम में परसाई जी के प्रवेश पर लोगों की नज़रें सहज ही उनकी तरफ उठती थीं।
कहना ज़रूरी है कि परसाई जी ने जैसा लिखा वैसा ही वे जिये। अपने मूल्यों से समझौता न कर पाने के कारण उन्होंने दो बार शिक्षक की नौकरी छोड़ी और फिर अन्त में पूरी तरह मसिजीवी हो गये। उनके ऊपर बहन के परिवार की ज़िम्मेदारी थी। कल्पना करें ऐसे व्यक्ति की जो चलने फिरने से लाचार हो, जो अपनी कलम के बल पर अपने संपूर्ण परिवार का जीवन-यापन करता हो और फिर भी अपने आत्मसम्मान से समझौता न करता हो। ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने लिखा है कि उन्होंने शुरू से ही अपनी छाती को कड़ा कर लिया था और इसे उन्होंने अन्त तक निभाया। पूरी ज़िन्दगी गर्दिश में रहने के बावजूद उन्होंने अपने को किसी की दया का पात्र नहीं बनने दिया।
यह कहना भी ज़रूरी समझता हूं कि मैंने महसूस किया कि परसाई जी के संपर्क में आने से व्यक्ति का जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता था। उनके जीवन को देखने और उनके साथ उठने- बैठने से व्यक्ति अनेक क्षुद्रताओं से मुक्त हो जाता था। उसके लिए उन मार्गों को अपनाना भी कठिन हो जाता था जो आज ऊपर पहुंचने की आसान सीढ़ी माने जाते हैं। मेरे जीवन पर परसाई जी की जो छाप पड़ी वह शायद अन्त तक कायम रहेगी। लेखन के प्रारंभ में मेरी एक कहानी तब की प्रसिद्ध पत्रिका ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई थी जिसे लोगों ने बहुत पसन्द किया था। बड़ी भावुकतापूर्ण कहानी थी जिसमें एक सामन्त की उदारता का चित्रण था, जो अपने बुरे दिनों में भी एक परिचित को उसकी बेटी के विवाह के लिए दिये गये गलीचे को वापस लेने से इनकार कर देता है क्योंकि वह बेटी की शादी के लिए दिया गया था। परसाई जी ने इस कहानी को पढ़ा था और जब मैं उनसे मिलने गया तो उन्होंने बहुत संक्षेप में अपनी राय मुझे बतायी। वे कहानी में सामन्त के महिमामंडन से खुश नहीं थे। उनका मत था कि सामन्त के पास जो भी वैभव होता है वह सब जनता का होता है। बात मेरी समझ में आयी और इसका नतीजा यह हुआ कि मेरे आज तक सात कहानी-संग्रह निकलने के बाद भी वह कहानी किसी संग्रह में देने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
एक बार महाराष्ट्र के एक व्यंग्यकार परसाई जी से मिलने आये थे। वे परसाई जी की स्थिति को देखकर भावुक हो गये थे और उन्होंने लौटकर एक प्रसिद्ध पत्रिका में एक पत्र छपवाया था जिसमें लिखा कि परसाई जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उन्हें सरकारी मदद मिलना चाहिए। परसाई जी ने उसे पढ़कर तुरन्त पत्रिका को अपना प्रतिवाद भेजा कि वे अपनी देखभाल करने में समर्थ थे और उन्हें किसी मदद की ज़रूरत नहीं थी। शारीरिक असमर्थता के बावजूद दयनीय बनना परसाई जी के स्वभाव के विपरीत था।
एक समय परसाई जी अवसाद में घिर गये थे और उन्होंने लोगों से बातचीत करना बन्द कर दिया था। उसी बीच मैं उनसे मिला और अपने पहले व्यंग्य-संग्रह का फ्लैप-मैटर लिखने का उनसे अनुरोध किया। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और मैं स्थिति को समझ कर लौट आया। उसके बाद उनके दुख-सुख के साथी, ‘देशबंधु’ पत्र के प्रधान संपादक स्व. मायाराम सुरजन उन्हें अपने साथ रायपुर ले गये और स्वस्थ होने तक उन्हें वहीं रखा। उनके लौटने पर जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने स्वयं ही मुझसे कहा कि वे मेरी पुस्तक का फ्लैप-मैटर लिखेंगे और उन्होंने उसे लिखा भी। वे ऐसे ही संवेदनशील थे।
परसाई जी दूसरों की निन्दा में रुचि नहीं लेते थे। मुझे याद है मैंने एक बार एक ऐसे व्यक्ति के बारे में, जो उनके भी निकट थे, उनसे कहा था कि वे प्रतिभा-संपन्न होते हुए भी अपनी प्रतिभा का सही उपयोग नहीं कर रहे थे और एक तरह से अपना जीवन नष्ट कर रहे थे। परसाई जी ने छूटते ही पूछा कि मैं कैसे कह सकता था कि वे अपना जीवन नष्ट कर रहे थे। मैं उनकी बात समझ कर चुप हो गया। जीवन की सार्थकता की कोई एक परिभाषा और एक पैमाना नहीं हो सकता। अपने द्वारा गढ़े हुए पैमाने को ही उचित मानना नासमझी है।
परसाई जी वामपंथी थे। वे लंबे समय तक प्रगतिशील लेखक संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रहे। समाजवाद की स्थापना उनका स्वप्न और उनकी प्रेरक-शक्ति थी, लेकिन अन्त में वे निराश होने लगे थे। एक दिन मेरे सामने ही उन्होंने एक मित्र से कहा था कि उन्हें लगता था कि उनके जीवन-काल में समाजवाद नहीं आएगा।
पैर की खराबी को परसाई जी ने झेल लिया था, लेकिन जीवन के अन्तिम दिनों में मोतियाबिंद के असफल ऑपरेशन ने उन्हें तोड़ दिया था। उनकी एक आंख खराब हो गयी थी। मिलने वालों के सामने वे उस आंख को ढकने की कोशिश करते थे। एक मसिजीवी के लिए यह बड़ा आघात था। इसी मायूसी की स्थिति में वे एक रात नींद में ही दुनिया से विदा हो गये। ज़ाहिर है कि अपनी छाती कड़ी रखने की उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।
परसाई जी के संबंध में यह कहना ज़रूरी है कि उनके लिए लेखन मात्र लेखन नहीं रहा। वह उनके लिए एक मिशन और एक आंदोलन रहा। ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने लिखा कि उन्होंने लेखन को दुनिया से लड़ने के लिए एक हथियार के रूप में अपनाया होगा। अपनी रचना ‘साहित्य और सरकार’ में वे लिखते हैं, ‘जो कैरियर की धुन में है उसे तो एकदम साहित्य रचना बन्द कर देना चाहिए। साहित्य रचना तपस्या तो है ही। इसमें मिटना तो पड़ता ही है।’ अपने लेख ‘साहित्यकार का साहस’ में वे लिखते हैं, ‘साहित्य हमारे यहां व्यापार कभी नहीं रहा, वह धर्म रहा है। अभी भी वह धर्म है, एक मिशन है। इसमें मिटना पड़ता है। जो इसमें बनना चाहते हैं वे बेहतर है आढ़त की दुकान खोलें। इसमें तो कबीर की तरह घर फूंक कर बाहर निकलना पड़ता है। यह ‘खाला का घर’ नहीं है।’
दुनिया के कई बड़े लेखक कालांतर में सोशल एक्टिविस्ट हुए। लेखक को कभी यह लगने लगता है कि लेखन से उसके कर्तव्य की पूर्ति नहीं होती। समाज में प्रत्यक्ष भागीदारी ज़रूरी है। पैर खराब होने से पूर्व परसाई जी अनेक अवसरों पर सामाजिक आंदोलनों में भाग लेने लगे थे। समझा जा सकता है कि यदि वे स्वस्थ रहते तो निश्चय ही उनकी इस भूमिका में और वृद्धि होती।
कुछ आलोचक परसाई जी के लेखन में ‘सिनिसिज़्म’ या एक नकारात्मक दृष्टिकोण पाते हैं, किंतु यह नज़रिया सही नहीं है। परसाई जी द्वारा व्यंग्यकार जयप्रकाश पांडेय को दिये गये साक्षात्कार में इस आक्षेप का उत्तर मिलता है। वे कहते हैं— ‘यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूं, पर वास्तव में मैं बहुत दुखी आदमी हूं। दुखी होकर लिखता हूं। मैं इसीलिए दुखी हूं कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, मेरे लोगों का क्या हाल है, मनुष्य का क्या हाल होता जा रहा है। ये सब दुख मेरे भीतर है। करुणा मेरे भीतर है। इस कारण से करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती ही है। इस प्रकार यह बात है कि जैसे मैं विकट से विकट ट्रेजेडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूं उसी प्रकार उस करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूं या उन पर विनोद करता हूं।’
इसी संदर्भ में अपने लेख ‘तब की बात और थी’ में परसाई जी अपने लेखन के बारे में लिखते हैं— ‘यह भी कहा गया है कि मेरा व्यंग्य बड़ा कटु होता है। होता तो है। पर चट्टान सी बुराई पर अगर कोई सुनार की छोटी हथौड़ी से प्रहार करे तो यह उसकी नासमझी ही कही जाएगी। चट्टान पर तो लुहार के घन का भरपूर हाथ ही पड़ना चाहिए। सामाजिक बुराइयों के प्रति मैं बहुत कटु हूं। शेर को ‘टॉय गन से’ जिस दिन मारना संभव हो जाएगा उसे दिन फिर सोचूंगा कि क्या करूं।’
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि परसाई जी का साहित्य सोद्देश्य, समाज के हित में, समाज में परिवर्तन की आकांक्षा से रचा गया। उनके मित्र स्व. मायाराम सुरजन ने उनके विषय में लिखा, ‘परसाई जैसे व्यक्ति के बारे में जिसकी निजी ज़िंदगी केवल दूसरों की समस्याओं की कहानी हो, अपनी कहने को कुछ नहीं।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







साधुवाद!🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।
शत शत नमन शानदार अभिव्यक्ति
धन्यवाद, भावना जी।