श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६७ ☆

?  आलेख – व्यंग्य साहित्य में जोशी,  परसाई और त्यागी की त्रयी के साम्य ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य साहित्य के तीन ऐसे समकालीन प्रारंभिक लेखक हैं जिन्होंने अपनी कलम से समाज की विसंगतियों, राजनीति की धूर्तताओं और व्यक्ति की कमजोरियों को पकड़कर इस ढंग से प्रस्तुत किया कि पाठक हंसते हुए भी भीतर से कटु यथार्थ का अनुभव कर सके। तीनों के लेखन में विषय  लगभग समानांतर हैं, अंतर केवल शैली और प्रस्तुति का है।

कोई समाज की नसों पर उस्तरे की धार रख देता है, तो कोई उसकी चोट को मुस्कान में लपेट देता है। यही कारण है कि जब इनकी कृतियों को साथ पढ़ा जाए तो लगता है मानो अलग-अलग नदी की धाराएं शाश्वत विसंगति के एक ही सागर की ओर बढ़ रही हों।

शरद जोशी की लेखनी व्यंग्य में भाषा की सरलता और आम आदमी के अनुभव से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने एक जगह लिखा कि गांव का आदमी अब शहर को इस तरह देखता है जैसे किसी बड़े रिश्तेदार का घर हो, जहां हमेशा कुछ न कुछ मुफ्त में मिल सकता है। यह टिप्पणी न केवल गांव-शहर के बीच बढ़ते अंतर को उजागर करती है, बल्कि उस मानसिकता पर भी करारा व्यंग्य है जिसमें हम निरंतर सुविधा पाने की आस में जीते हैं। इसी तरह परसाई जब लिखते हैं कि लोकतंत्र का असली खेल चुनाव जीतने के बाद शुरू होता है, तो उनकी दृष्टि सीधे सत्ता और समाज के बीच मौजूद उस फरेब को उजागर करती है जिसे सामान्य जनता अक्सर देख कर भी अनदेखा कर देती है। रवींद्र त्यागी की शैली यहां भिन्न है, वे आम आदमी की असहायता को हल्की फुल्की हंसी में बांधते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने एक जगह कहा कि आज का आदमी बिजली बिल देखकर इस तरह कांपता है जैसे प्रेम पत्र पत्नी के हाथ में आ गया हो। यह तुलना हास्य से भरपूर है लेकिन साथ ही उस भयावह आर्थिक बोझ पर भी तीखी टिप्पणी है जो आज भी हर घर में मौजूद है।

तीनों लेखकों की सामूहिक समानता यह है कि ये सीधी भाषा में गहरे सच बोल जाते हैं। शरद जोशी के व्यंग्य में अक्सर रोजमर्रा की घटनाएं मिलती हैं। वे जब कहते हैं कि आदमी अब आदमी कम और पद अधिक हो गया है, तो इसमें हमारे समाज की पद-पूजा की विडंबना स्पष्ट होती है। यही बात परसाई और त्यागी भी अलग अंदाज में कहते हैं। परसाई इसे राजनीतिक दृष्टि से खोलते हैं कि नेता के पास नाम कम, पद अधिक होता है और त्यागी इसे पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में दिखाते हैं कि घर के बड़े बूढ़े भी अब केवल अपने पदनाम से सम्मानित होते हैं, उनकी वास्तविकता को कोई याद नहीं करता।

परसाई की धार सबसे तीखी तब दिखती है जब वे कहते हैं कि जो समाज ईमानदार आदमी को मूर्ख मानने लगे वहां की नैतिकता का अंत हो चुका है। यह कथन हमें चौंकाता है और सोचने पर विवश करता है। इसके बरक्स शरद जोशी जब यह लिखते हैं कि आदमी आज इतना समझदार हो गया है कि मूर्ख बनने से डरने लगा है, तो वह भी समाज की इसी मानसिकता का दूसरा पहलू प्रस्तुत करते हैं। वहीं रवींद्र त्यागी इस विडंबना को हल्का कर देते हैं और लिखते हैं कि ईमानदार आदमी अपने जीवन में वही है जो जूते बिना बारिश में चल रहा हो, सब तरफ कीचड़ है और उसे बार-बार पैर धोना पड़ता है। तीनों की दृष्टि एक ही तथ्य को अलग-अलग लेंस से उनके अपने शब्द परिप्रेक्ष्य से पकड़ती है।

व्यंग्यकारों की सबसे बड़ी शक्ति उनकी समयानुकूलता होती है। चुनावी राजनीति हो या भ्रष्टाचार, परिवार की टूटती संरचना हो या विज्ञान और तकनीक पर बढ़ती निर्भरता, हर विषय पर इन लेखकों ने अपना व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण दिया। शरद जोशी ने जब कहा कि आदमी अब अखबारों के शीर्षकों में ही जीने लगा है, तो उन्होंने मीडिया पर भी तीखा व्यंग्य किया। परसाई ने अखबारों की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए लिखा कि ये वही दर्पण हैं जिनमें चेहरा असली नहीं दिखता बल्कि सजाया हुआ दिखता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने समाचार की बेतुकी प्रवृत्ति पर लिखा कि अब अखबार का सबसे अच्छा हिस्सा विज्ञापन रह गया है, क्योंकि बाकी खबरें तो आदमी का मूड ही बिगाड़ देती हैं।

भ्रष्टाचार पर तीनों की कलम लगभग एक स्वर में उठी। शरद जोशी ने टिप्पणी की कि अब तो रिश्वत लेना भी कला हो गई है, ठीक वैसे जैसे कोई कलाकार ब्रश से चित्र बनाता है। परसाई ने सीधे कहा कि भ्रष्टाचार अब भारतीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है और ईमानदारी इतिहास की वस्तु है। रवींद्र त्यागी ने इसे व्यंग्य में हल्का बनाते हुए लिखा कि ईमानदार अफसर वही है जिसकी नौकरी बस पेंशन तक पहुंच जाए, बाकी सब तो रास्ते में मिलते हुए स्टेशनों पर टिकट कलेक्टर की तरह कुछ न कुछ वसूलते जाते हैं।

व्यक्तिगत जीवन और परिवार पर भी इन तीनों की दृष्टि महत्वपूर्ण है। शरद जोशी ने लिखा कि पति-पत्नी का रिश्ता आजकल बिजली और पंखे जैसा है, दोनों साथ हों तो हवा मिलती है और न हों तो घुटन। परसाई ने परिवार की विडंबना इस रूप में रखी कि हर घर में लोकतंत्र की बातें होती हैं लेकिन घर का बजट तानाशाही से ही चलता है। वहीं रवींद्र त्यागी ने परिवार की स्थिति का मजाक उड़ाते हुए लिखा कि आजकल घर का सबसे शांत सदस्य टीवी है, बाकी सब तो शोर मचाने में लगे रहते हैं।

इन सब उद्धरणों से स्पष्ट है कि शरद जोशी, परसाई और रवींद्र त्यागी तीनों की रचनात्मक दृष्टि समाज की गहराइयों तक उतरती है। कोई उसे तीखे शब्दों में प्रस्तुत करता है, कोई मुस्कान के पीछे छिपा देता है। तीनों की लेखनी पाठक को हंसाती भी है, चुभोती भी है और सोचने पर मजबूर करती है। विसंगति पर कटाक्ष से प्रहार की यही साहित्यिक समानता उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। जब हम इन्हें पढ़ते हैं तो लगता है कि तीनों ने मिलकर हमारी सामाजिक चेतना का एक विशाल दर्पण तैयार किया है, जिसमें हम अपनी ही विडंबनाओं को देख सकते हैं।

इस प्रकार शरद जोशी के सहज और चुटीले व्यंग्य, परसाई की गहरी सामाजिक दृष्टि और रवींद्र त्यागी की हल्की फुल्की हास्यपूर्ण शैली मिलकर हिंदी व्यंग्य साहित्य को ऐसी ऊंचाई पर ले गए हैं जहां हंसी और गहराई साथ-साथ बहती है। उनके रचनाओं से उद्धृत साहित्यिक उदाहरण यह दिखाते हैं कि भाषा, शैली और दृष्टिकोण चाहे अलग-अलग क्यों न हों, पर उनका लक्ष्य एक ही है कि समाज आईने में अपना असली चेहरा देख सके। यह साहित्यिक समानता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके लेखन काल में थी और शायद यही उनकी रचनाओं की स्थायित्व की शक्ति है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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जगत सिंह बिष्ट

अति उत्तम। बहुत सही आकलन।
साधुवाद!
🙏🙏