श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख “महाआरती ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ ☆
🌻आलेख🌻 🪔महाआरती 🪔
समय के साथ सब बदल जाता है। नही बदलता तो सिर्फ बड़े – छोटे, अमीरी – गरीबी, छल-छलावा, ऊँच- नीच, जात – पात।
मान सम्मान तो पलक झपकते ही बदल जाते हैं। ऊँचे भव्य पंडाल में महाआरती का आयोजन।
यदि कोई समान्य आमजन का पंडाल बना जिसमें मध्यमवर्गीय परिवार है। वो महाआरती के विशेष आयोजन को करने अपने से बड़ों को बुलाते हैं, परन्तु वही महाआरती जब कुछ उच्च वर्ग और अमीर पंडाल है तो मध्यमवर्गीय को आरती दूर से देखने को मिलता है, परन्तु उतारा करके ग्रह दोष शांत कर भंडारा खिलाते उन्हें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को पंक्तियां बनवा देते हैं। और सभी लाईन लगकर भंडारा लेते भी है क्योंकि उन्हें वह बड़े आदमियों का प्रसाद वितरण लगता है।
माँ के आँचल में क्या अमीर क्या गरीब? पर हाय रे माया जीवन को सार्थक बनाने के लिए महाआरती करने के लिए पैसा और हैसियत दोनों का होना कितना जरुरी है।
जगजननी आज भी मोहनी रुप धारण करने का समय आ गया है। जहाँ पर पाप, बड़े अमीर, हैसियत, और बड़े रुदबे रुपी दानव से बचाकर संस्कार, सादगी, सहजता भावों को अमर करना होगा।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





