श्री संजय भारद्वाज
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०८ ☆ ताला…
दीपावली संपन्न हो चुकी है। त्योहार का ख़ुमार उतर रहा है। जीवन रोज़ के ढर्रे पर लौट रहा है।
लगभग पाँच दिन बाद आज संध्या भ्रमण के लिए निकला हूँ। बहुधा मैं लिफ्ट का प्रयोग नहीं करता। अपने फ्लैट से सीढ़ियों द्वारा नीचे की मंज़िलें उतरते हुए देखता हूँ कि अधिकांश फ्लैटों के दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है। कामकाजी दिनों में सुबह से शाम तक ताला दिखता है। आज शाम को दिख रहा है। संभव है कि लोग अपने परिजनों या परिचितों से दीपावली मिलने गए हों। यह भी हो सकता है कि पिछले चार-पाँच रोज़ से घर में होने से उकताकर आज आउटिंग या बाहर भोजन के लिए चले गए हों। अलबत्ता घरों के दरवाज़े पर ताला अब ‘न्यू नॉर्मल’ है।
स्मरण हो आता है कि माँ ने हमेशा प्रयास किया कि घर पर ताला न लगे। घर वही जो सदा खुला रहे, अपनों के लिए और अतिथियों के लिए भी।
उनकी पीढ़ी ने वह समय देखा था जब दरवाज़े भोर के समय खुलते और रात को ही बंद होते। पथिक, पंछी, पशु सबके लिए घर में भोजन बनता। चींटियों को आटा डाला जाता। बिल्ली को प्रसव पर हलवा बनाकर खिलाया जाता। कुत्तों के लिए रोटी बनती। पंछियों को दाना चुगाया जाता। गौ-ग्रास तो सदैव प्रथम स्थान पर था ही।
सामूहिक परिवार, समय के साथ एकल हुए। गाँव के बड़े, खुले, हवादार मकान छूटे। आदमी फ्लैटों के दड़बे में घुसा। बदली हुई परिस्थितियों और घटते मानव संसाधन के बीच ताला घर के दरवाज़े पर अपना स्थान मजबूती से बनाता चला गया।
निर्विवाद सत्य है कि वर्तमान जीवन शैली में दरवाज़े पर ताला अपरिहार्य है। दरवाज़े पर लटका स्थूल ताला सामान्यत: भीतर कुछ आने नहीं देता। स्थूल का सूक्ष्म विश्लेषण करें कि ताला कहीं जड़ता की ओर तो नहीं ले जा रहा? हमारी सोच और मन पर जो ताला जड़ता जा रहा है, उससे बाहर कैसे आया जाए? इसे भावुक चिंतन कहकर खारिज़ किया जा सकता है। तथापि मनुष्य चिंतन नहीं करेगा तो कौन करेगा? इसी चिंतन के चलते आदमी ने आदिम से आधुनिक की यात्रा की है। फिर कोई किसी क्षेत्र में कितना ही अग्रगण्य हो जाए, परिष्कार और परिमार्जन की संभावना सदा बनी रहती है।
चिंतन का निष्कर्ष है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन भी अब ‘न्यू नॉर्मल’ की सूची में शामिल हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए आज कौंसिलर के पास जाना पड़ता है। सहज संवाद छूट चला है, केवल एकालाप ही बचा है। मानसिक विरेचन के लिए आवश्यक रिश्तों पर ताला लगा है।
इन तालों पर ‘बंदीगृह’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-
बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो,
कारागार अप्रासंगिक हो चुके।
मजबूत फाटकों पर टंगे विशाल ताले
जड़े जा चुके हैं मनुष्य के मन पर,
हथकड़ियॉं, हाथों में बेमानी लगती हैं,
वे, उग, जम, और कस, रही हैं नसों में,
पैरों की बेड़ियॉं गर्भस्थ शिशु के साथ ही
जन्मती और बढ़ती हैं, क्षण-प्रतिक्षण
…..बस बुढ़ाती नहीं।
विसंगतियों के फंदे
फॉंसी बनकर कसते जा रहे हैं,
यहॉं-वहॉं टहलते जानवर
रुपये के खूँटे से बंधे
आदमी पर तरस खा रहे हैं।
भूमंडलीकरण के दायरे में
सारा विश्व बड़े से बंदीगृह में
तब्दील हो चुका, इसलिए कहता हूँ-
बंदीगृह के सारे दरवाज़े खोल दो
कारागार अप्रासंगिक हो चुका।
मन पर जड़ते इन तालों को हथौड़े से तोड़ने की नहीं अपितु स्नेह, सामंजस्य और विश्वास की चाबी से खोलने की आवश्यकता है। माना कि एक आलेख भर से ताला टूटेगा नहीं, पर बीच-बीच में कुछ समय के लिए ही क्यों ना सही, दरवाज़ा खुला रखने का भाव भी जाग जाए तो चिंतन और लेखन सार्थक है।
इस वर्ष हम अपने-अपने, मन पर जड़े ताले खोलने की दिशा कुछ कदम भी आगे में बढ़ सकें तो चिरंजीव प्रकाश-उत्सव की आभा कई गुना बढ़ जाएगी।
शुभं अस्तु।
© संजय भारद्वाज
प्रात: 5:34 बजे, 25 अक्टूबर 2025
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
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≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




