डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – ‘‘शिव’ की भूमिका में आदमी (वैचारिकी)। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०८ ☆
☆ आलेख ☆ ‘शिव’ की भूमिका में आदमी (वैचारिकी) ☆
मनुष्य को सब जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। गोसाईं जी कह गये हैं— ‘बड़े भाग मानुस तन पावा, सुर दुरलभ सदग्रंथन गावा।’ यानी मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से मिलता है और मनुष्य की योनि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
वानर की प्रजाति में जन्म लेकर मनुष्य ने अभूतपूर्व प्रगति की। हाथों को चलने की क्रिया से मुक्त किया, पत्थर और लोहे के औज़ार बनाये, परिवार बनाया, खेती-किसानी सीखी। मनुष्य की प्रतिभा और उसके श्रम ने दुनिया की सूरत बदल दी। मनुष्य के लिए नैतिकता के मानदंड बने, नियम बने, कानून बने। नतीजतन मनुष्य को सभी जीवों में सबसे बुद्धिमान,सबसे ताकतवर, सबसे सभ्य और नैतिकता का अनुसरण करने वाला माना जाने लगा। सभी देशों को परस्पर जोड़ने और उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए विश्व स्तर पर संस्थान स्थापित हुए।
लेकिन कुल मिलाकर समझ में आया कि मनुष्य की झगड़ालू प्रवृत्ति यथावत है। हर समय दुनिया के किसी न किसी कोने में आदमी आदमी से जूझता रहता है। आदमी ने ऐसे घातक उपकरण विकसित कर लिये हैं कि मिनटों में लाखों जीवन को समाप्त किया जा सकता है। हिरोशिमा और नागासाकी उदाहरण हैं। इसी प्रवृत्ति के कारण दो विश्वयुद्ध हुए और लाखों जानें गयीं। नेपोलियन ने 1812 में रूस पर आक्रमण किया। उसके छः लाख सैनिक इस अभियान में गये, सिर्फ एक लाख ही वापस लौट पाये। पांच लाख रूस की मिट्टी में दफ़न हो गये। इसका विशद वर्णन टाल्सटाय के महान उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ में मिलता है। इतने जीवन नष्ट होने के बाद भी हिटलर जैसे राष्ट्राध्यक्षों के दिमाग़ से युद्ध का भूत नहीं उतरा। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया। युद्ध में दोनों पक्षों के करीब अस्सी लाख सैनिक और नागरिक मारे गये।
फिलहाल फिलिस्तीन की ज़मीन पर इज़रायल और हमास का युद्ध चल रहा है जिसमें 68000 निर्दोष लोग बलि चढ़ चुके हैं, जिनमें से 20- 25 हज़ार बच्चे थे जो दुनिया को आंख भर देखे बिना ही विदा हो गये। बड़ी-बड़ी इमारतें मलबे में बदल गयीं, पूरी बस्ती श्मशान में तब्दील हो गयी, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। भोजन के लिए बर्तन लेकर लाइन में लगे भूखे बच्चों पर गोलियां चलीं। परिवार के परिवार साफ हो गये। इन मौतों पर रोने वाला कोई नहीं। उधर रूस और यूक्रेन के युद्ध में भी लोग रोज़ मर रहे हैं। दोनों तरफ तर्क दिया जाता है कि भविष्य में उनके लिए ख़तरा पैदा हो सकता है, इसलिए मारना जायज़ है।इन प्रकरणों में दुनिया का चौधरी, संयुक्त राष्ट्र संघ, लाचार बना बैठा है।
शेर को प्रकृति ने मांसाहारी बनाया है, हम उसे हिंसक कहते हैं। लेकिन वह दूसरे जीवों की हत्या तभी करता है जब उसे क्षुधा सताती है। पेट भरा होने पर वह अन्य जीवों की तरफ देखता भी नहीं। लेकिन आदमी की हिंसा की भूख के लिए कोई कारण ढूंढ़ पाना मुश्किल है। कई बार आदमी को मनोरंजन के लिए भी मार दिया जाता है। पुराने ज़माने में कुछ देशों में अपराधियों को शेर का सामना करने के लिए छोड़ दिया जाता था। इससे दंड की प्रक्रिया भी पूरी होती थी और तमाशबीनों का पर्याप्त मनोरंजन भी होता था।
आदमी ने अपनी हरकतों से सिद्ध किया है कि वह सभ्य, सुशिक्षित, संवेदनशील होने का कितना भी ढिंढोरा पीट ले, भीतर से वह वही है जो वह लाखों साल पहले था, जब रक्त-प्रवाह देखकर वह आनंदित होता था।
ऐसा लगता है कि त्रिदेव में से शिव की संहारक वाली भूमिका को मनुष्य अपने हाथ में लेने के लिए आतुर है। ज्ञानी कहते हैं कि जो जान नहीं देता उसे जान लेने का अधिकार नहीं है, लेकिन मनुष्य की नज़र में ये बातें निरर्थक हैं।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




